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Monday, January 30, 2023

सनम तेरे बिना

 दालान भर अंधेरे हैं सनम तेरे बिना

हर रात कटती जीवन की सवेरे बिना


दोस्तों की महफिल मैं खोए खोए से हैं

शब्द भी सन्नाटो ने घेरे हैं  सनम तेरे बिना


अंधेरे रास आ गए हैं हमें इस कदर

उदासी की चादर में छिपे बैठे है उजारे तेरे बिना


मायूस सा कर गया हार जीत का खेल

अब तो हार भी मान जाते हैं  सनम हारे बिना


सांस लेने का हुनर  ज़िंदगी ने सिखा दिया

यूं तो गुजरता हर पल सनम  गुजारे बिना


ना मंजिल की खबर ना  राह है कोई

 बस भटकते फिरते हैं खुद को संवारे बिना


कोशिश तो बहुत  है  स्मित के दिए जला लें

खुशियों के फूल खिल ना सके पर सनम तेरे बिना


दालान भर अंधेरे हैं सनम तेरे बिना

हर रात कटती जीवन की सवेरे बिना




Wednesday, September 15, 2021

Heart to heart

 How does a woman on the wrong side of sixties supposed to live after her soulmate departs suddenly? How is she supposed to deal with living alone day after day in the house  she shared with her life companion of nearly forty years? What's expected of her? How does the society perceive her? 

 Shouldn't she be seen wrapped up in mourning ensemble, moping in a corner, waiting for the dooms day to join her beloved ? It seems some "well wishers" would like that very much as that would be the validation of her love and devotion to her beloved. How can she not shed tears and hide her devastated state of mind and not sink into a fathomless pit of loneliness and deprivation ? 

 Wouldn't doing the opposite make her being unfaithful to the dear departed ?

While ensconced in their happy,  normal family life they just sit there and judge. They don't see the effort to combat the day to day pain, the will power to rise above the constant strain of loss and grief and show a brave face to the world. So that the people dont get the vicarious pleasure of  doling out sympathy and advice,  subconsciously relishing her suffering.

For them, if she makes the herculean effort to live for her self and/or her progeny trying her best not to deprive them of another parent and or   showcases/shares the small delights she shares with them or with family, is bordering on blasphemy!

After all she's an indian middle class wi....w. 

(Can't even bring myself to use the word).

The only consolation is that such "well-wishers" form a miniscule minority!!

Tuesday, March 23, 2021

क्या हम दूसरों की सोच बदल सकते हैं

 

दूसरों की सोच व विचारों को बदलना बहुत कठिन है परंतु असंभव नहीं है।
स्वभाव से मनुष्य यही समझता है कि वह ठीक है और दूसरे गलत। कहीं पढ़ा था कि "यदि आप किसी को अपना शत्रु बनाना चाहते हैं तो उसे कहिए कि वह गलत है।" हर व्यक्ति ज्यों ज्यों बड़ा होता है उसके मूल्य, जीवन दर्शन व विचार निश्चित हो जाते हैं। उसकी सोच उसके पारिवारिक समाजीकरण, सामाजिक परिपेक्ष्य अनुसार पनपती है। इसमें पारंपरिक मूल्यों का भी योगदान होता है। जैसे जैसे हम परिपक्व होते हैं हमारे विचार भी दृढ़ होते जाते हैं। परंतु आज के डिजिटल युग में टैक्नोलॉजी के बदलते आयामों के साथ हमारी जीवन शैली, हमारे दृष्टिकोण व सोच भी बदल रहे हैं।
हर नई पीढ़ी को लगता है कि वे अपने बड़े बूढ़ों की सोच को नहीं बदल सकते। विशेषकर पुराने रीति रिवाजों को बदलना उनके लिए बहुत कठिन होता है। दूसरे की सोच को बदलना है भी बहुत कठिन।
फिर भी यदि आप किसी के विचारों से असहमत हैं तो उसका उपहास उड़ाए बिना तर्क तथा उदाहरण के साथ अपनी बात रखें, शुभ चिंतन करें और खुले मन से उनकी बात भी सुनें। तर्क शीलता व तथ्यों पर आधारित विचार विमर्श से दूसरे के विचारों को प्रभावित किया जा सकता है। इसके लिए वस्तुनिष्ठ  खुला मन व प्रभावशाली प्रतिपादन की कला चाहिए। यदि आपके तर्क ठोस तथ्यों से भरपूर है और दूसरे को पता है कि आप उसके शुभ चिंतक हैं तो वह किसी विषय के बारे मे अपनी सोच बदल सकता है

Friday, March 19, 2021

हमारी विरासत और हम

 

विरासत देश  और लोगों की पहचान को परिलाक्षित करती  है।
भारत एक ऐसा देश है जहाँ की विरासत अत्यंत विस्तृत, समृद्ध तथा विविध है। हमारी यह बहुमूल्य विरासत  केवल स्‍मारकों ,  कला वस्‍तुओं के संग्रहण तथा ऐतिहासिक स्थानों तक ही सीमित  है बल्कि इसमें हमारी परंपराएं , हमारी सोच व जीवनशैली भी शामिल  है जो सदियों से चलती आई है। हमारे पूर्वजों से प्राप्‍त
इस समृद्ध तथा अद्वितीय विरासत को बचाये रखना हमारा कर्तव्य भी है और अधिकार भी। हमारी परंपराएं, कला प्रदर्शन, धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक उत्‍सव और परंपरागत शिल्पकारी हमारे
गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं। हमारे पूर्वजों ने सदियों से हमारी विरासत को संरक्षित किया है,  हमें अपनी जड़ों से जोड़ कर रखा है। हमारा भी कर्तव्य है युवा पीढ़ी में अपनी विरासत के लिए प्रेम का आह्वान करें। शुरू से ही  युवा पीढ़ी को हमारे गौरवशाली अतीत से परिचित कराएं।  इससे उनके अंदर गर्व की भावना लाने में मदद मिलेगी और वे परंपरा को जारी रखने के लिए प्रेरित होंगे । इसके लिए शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों के सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
आज के विश्वीकरण एवं औद्योगिकीकरण के युग में हम बेशक पश्चिमी मूल्यों व जीवन शैली की ओर उन्मुख हो रहे हैं ।  टेक्नोलॉजी से हो रहे  तीव्र परिवर्तनों  के कारण आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज़ हो रही है। ऐसे में अपनी विरासत को सुरक्षित रख पाना वाकई किसी चुनौती से कम नहीं है।  इन सब की महत्ता से भी  इंकार नहीं किया जा सकता। आवश्यकता है दोनों में सामंजस्य बिठाने की। हमें चाहिए कि हम किसी देश से पीछे भी न रहें । साथ में अपनी समृद्ध विरासत से गौरवान्वित हो उसे अगली पीढ़ी को भी पारित करें। 

यही हर भारतीय के जीवन का उद्वेश्य होना चाहिए।


Tuesday, March 16, 2021

क्या जीवन लक्ष्य बिना व्यर्थ है

 

क्या जीवन लक्ष्य बिना व्यर्थ है

कहीं पढ़ा था कि लक्ष्य हीन जीवन बिना पते के लिफाफे की तरह होता है जो इधर उधर पड़ा रहता है। सचमुच लक्ष्य होना जीवन को दिशा प्रदान करता है, सार्थक बनाता है। बचपन से ही हम सपने देखने लगते हैं कि बड़े होकर क्या बनेंगे। आजकल तो बच्चे के स्कूल में भर्ती होते ही उसके माता पिता भी उसके भविष्य के सपने संजोना शुरू कर देते हैं। वास्तव मे लक्ष्यहीन जीवन अधूरा है।
लक्ष्य से हमारा अभिप्राय केवल जीवन का ध्येय अथवा लक्ष्य नहीं हैं अपितु लक्ष्य छोटे छोटे भी हो सकते हैं। जैसे स्वस्थ जीवन शैली अपनाना, दूसरों के प्रति सहिष्णुता, दयालुता तथा मैत्रीभाव विकसित करना, अच्छे श्रोता बन दूसरों की बात सुनना आदि। कुछ भी करने या बनने का ध्येय निश्चित ज़रूर करना चाहिए। आवश्यक यह है कि जो भी लक्ष्य हम निर्धारित करें उसे पूरा अवश्य करें। अर्जुन की आंख की तरह हमारा पूरा फोकस उसी लक्ष्य पर होना चहिए। लक्ष्य निश्चित करना तथा उस के लिए कार्यशील रहना हमें उत्साह, स्फूर्ति व प्रेरणा से भरपूर रखता है। हमारे जीवन को उद्देश्य तथा मार्गदर्शन प्रदान करता है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि जिनके जीवन में कोई लक्ष्य नहीं उनका जीवन व्यर्थ ही है।
किसी ने सही कहा है..
जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
इन आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

Monday, March 15, 2021

हर समय खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए

 

हर समय खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए

खुशी एक मनोस्थिति है। एक सापेक्ष शब्द। प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुशी के अलग अलग पहलु या अर्थ हो सकते हैं परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि हर कोई खुश रहना चाहता है। और हर वक्त खुश रहने की भी इच्छा रखता है। और ऐसा संभव भी है,  यदि हम चाहें तो। इच्छाशक्ति हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता।
हर वक्त खुश रहने के लिए हमें कुछ आदतें डालनी होंगी।
     एक अच्छी नींद लेकर उठें और उठते ही मुस्कराइए। जी हां। मुकराने से हमारा ब्रेन डोपामिन पैदा करता है जोकि खुशी का हार्मोन है। एक नई भोर दिखाने के लिए ईश्वर का धन्यवाद कीजिए। या किसी भी  चीज़ के बारे में अपने मन में कृतज्ञता महसूस कीजिए। आप को अनिवर्चनीय आनंद की अनुभूति होगी। प्राणायाम तथा योग भी हमें खुशी देते हैं। सारा दिन हम तरोताजा व प्रफुल्लित रहते हैं। अपने मन को नकारात्मकता से दूर रखें। नकारात्मक लोगों से भी। अच्छी पुस्तकें पढ़े, अच्छे प्रोग्राम देखें और अपनी पसंद की हॉबी को समय दें। अपने जीवन के लक्ष्य स्वयं चुनें और उन पर पूरे उत्साह से फोकस करें। जीवन है तो दुःख सुख भी होंगे। अपने दुखों या जीवन की त्रासदियों को स्वीकारें और आगे बढ जाएं। अतीत में नहीं बल्कि भविष्य की सुखद कामना में जीना सीखें।
किसी जरूरतमंद की सहायता कीजिए। किसी बच्चे के साथ बच्चा बन मुस्कराइये। अपने परिवार जनों संग सुख दुख बांटिए। कुछ अपनी कहिए कुछ उनकी सुनिए।
आप भी हरदम खुश रहेंगे और आपके आसपास वाले भी। :)

Friday, March 12, 2021

Thought for Today: क्या हृदय की पुकार ईश्वर तक पहुंचती है

 

क्या हृदय की पुकार ईश्वर तक  पहुंचती है

प्रश्न यह नही है, प्रश्न है क्या हम ईश्वर को दिल से पुकारते हैं। यदि हां तो अवश्य ईश्वर तक हमारी पुकार पहुंचती है।
प्रभु हमारी आस्था हमारी निष्ठा के भूखे हैं। वे हमारे अटूट विश्वास के प्रतीक हैं। वे तो अंतर्यामी हैं। हमारी आत्मा में निहित हैं। उन्हें पुकारने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता।
मेरी स्वर्गीय मां ने एक बार एक स्वामीजी से पूछा,"मैं जब भी ईश्वर की पूजा में बैठती हूं मेरे अश्रु निकलते हैं। ऐसा क्यों?" स्वामीजी ने कहा था,"तुम्हारे पांच बच्चे हैं। जब तुम काम मे व्यस्त होती हो, यदि बड़ा बच्चा पुकारता है तो तुम कहती हो आती हूं और अपना काम करती रहती हो। पर यदि छोटा शिशु ज़ोर से रोता है तो काम छोड़ कर भागती हो। ऐसा क्यों"?
जब हम एक अबोध बालक की भांति सच्चे मन से प्रभु को पुकारते हैं तो वे भी सब कुछ छोड़ कर हमारी पुकार सुनते हैं। वे तो भाव के भूखे हैं।

कहा कहौं छवि आप की, भले बने हो नाथ !
तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान लो हाथ !!

तुलसी दास जी की पुकार सुन कर कृष्ण भगवान ने भी बांसुरी छोड़ धनुष बाण उठा लिया था।

डा. नीलिमा डोगरा

Thought For Today : हमारे जीवन में डर की भूमिका

 


डर अथवा भय एक ऐसी भावना है जो अप्रिय होते हुए भी  प्रत्येक जीवित प्राणी में अपरिहार्य रूप से मौजूद रहती है। कई वन्य जीवों के लिए तो यह जीवन प्रवृत्ति है। हम मानवों के जीवन का भी यह अभिन्न अंग है।  जीवन पर्यन्त हम किसी न किसी डर से जीते हैं। बचपन व किशोरावस्था में परीक्षा का, परिणाम का डर, कई प्रकार के पियर प्रेशर हमे भयभीत किए रहते हैं। हमारे समस्त जीवन में सब से बड़ा डर जो हमें घेरे रहता है वह है समाज का डर। लोग क्या कहेंगे! यह डर हमारे जीवन के कई महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करता है। इस डर से कई बार हम हमारे जीवन के दूसरे अति प्रिय संबंधों की भी उपेक्षा कर देते हैं। जबकि हमें अपनें व अपने परिवारजनों के वर्तमान अथवा भविष्य को समाज के डर पर प्राथमिकता देनी चाहिए।
जीवन के एक पड़ाव पर हमें मृत्यु का डर भी सताने लगता है। यद्यपि उससे डरने की अपेक्षा हमें इसे शाश्वत सत्य जान कर परम विश्राम का पड़ाव समझना चाहिए।
हमें डर को सकारात्मक ऊर्जा के रूप में लेना चाहिए। कई बार डर हमारे भीतर नई चेतना, स्फूर्ति व जागृति उत्पन्न कर देता है जो हमारे जीवन को नए आयाम दे सकते हैं।


Monday, December 21, 2020

SIBLINGS ARE NOT OPTIONAL

                            SIBLINGS ARE NOT OPTIONAL



 I have four siblings. Two brothers and two sisters. Old school!  Well maybe. But surely better than having no sibling at all!


Siblings  are your first best friends, your partners in crime. In fact having siblings is the most enduring relationship you have. As family is the first cradle of socialisation, having siblings makes it into a real family. You develop the feelings of altruism, learn sharing and  bonding and develop social and interpersonal skills. With siblings we develop informal behavioral traits like communication and negotiation skills, as says sociologists like Dr. Laurie Kramer.


The millennial parents do not even think about it. In fact the thought of even starting a family does not occur to them for many years after marriage. Its considered tacky to even discuss it.  And ofcourse having one child marks simultaneously the beginning and the end of  a family.


 The largest growing demographic today is  the one child family. The "only child syndrome" a concept created by G Stanley Hall in the 19th century is in vogue again. Even though he claimed that the"only children" were “spoilt, selfish and bossy”.  The same may be said of the "Little Emperors" born in China after the one-child policy was introduced in 1979.  They're a generation which have been labelled as selfish, spoilt, and maladjusted because they  have had no siblings to rival or share with. Even the psychologists  do not approve of it.  They believe that an only child could grow into an“oversensitive" person prone to “priggish self-conceit”.( Eugene W Bohannon)


Still the notion of only child has caught on. More so among the couples who are more career oriented, ambitious and driven. And of-course young. At this juncture of their life, with long hours of work, deadlines to meet, win the race for promotion, get a new house, invest in future et al, the option to start a family or have a second child takes a back seat. For some mothers who go in for their first child at mid thirties  after fulfilling their other goals, having a second one after a few years get fraught with other medical complications. And they do not want to risk it. It also feels prohibitive to once again get into the rut of sleepless nights, juggling hours and nanny hunting that a fresh child rearing entails. Then there's the financial angle as well. Modern parents are highly competitive and ambitious for their progeny too. Their child has to get the best education, get a foreign degree, best gadgets, the best of everything so bringing up one child is enough.


 So the poor child is deprived of having a sibling!


My first born was a baby girl, a child with special needs who needed special attention. So we did not go for a second child for many years lest she should be neglected. We doted on her, gave in to all her demands pampering her no end and ultimately spoiling her. She couldn't take no for an answer.  She was ten by the time we decided to give her a sibling that too after being rebuked by the doctors. So she got a sister eventually. Inspite of healthy sibling rivalry between the two, she learnt to accept her and love her. She started learning new things as the baby grew, sharing things and even being protective to the little one. The younger one too loved her sister unashamedly and we were proud parents revelling in their little achievements finding a purpose in life to nurture our little family. 


When my younger daughter was three I asked her once whether she would like another sibling. She vehemently declined and we did not give it another thought. We lost our special child when the younger one was twenty. And since that day she rues that she has no sibling to share her sorrows, joys or miletones in life. Worst was when she lost her father as well suddenly last year. She said to me, "mommy how could you heed the advice of a three year old while making such an important decision!  Now I won't have anybody to share my childhood memories once you are gone too." She expressed that feeling, even though she had had only a "special" sister as a sibling. 


The truth is that when we are young, living a busy life, pursuing many goals , living in just the 'moment', we don't think that far ahead. Our life choices are mostly archaic and expedient. By choosing to have only one kid, we are carving a lonely life for our kid, depriving him or her of the fun, laughter, sharing, squabbles, competitive rivalries, all the values that a family is about. We don't realize that we are choosing to shape up a future for our kid where he or she would be depriving their kids of an aunt or an uncle. Where there would be no extended family for their kids, no cousins, no family holidays, no real childhood. At this juncture, to young parents, old age looks so distant and their child's old age..well nobody gives it a thought at all. 


Nobody can predict where life takes us when we are at the dusk. When sometimes struck with tragedies, debilitated in mind and body we try to cope, they empathise with you giving you moral and emotional support. They are just there for you. Personally, being bereaved after losing my soulmate of thirty eight years in the blink of an eye, has made me realize how important it is to have siblings.


I thank my parents for giving me siblings.





Wednesday, October 7, 2020

शक

 


मैं बेसब्री से श्रुति की प्रतीक्षा कर रही थी। बचपन की सखियां दस वर्ष बाद मिल रहीं थी। केवल दो दिन के लिए बंगलोर आना हुआ था। कांफ्रेंस के बाद होटल के कमरे मेें ही खाना ऑर्डर कर रखा था। खूब बातें करेंगी दोनों।
श्रुति और मैं स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ थीं। अंतरंग सहेलियां, एक दूजे की राजदार, पार्टनर इन क्राइम। फिर उसकी शादी तय हो गई और मैं साइकोलॉजी में  पोस्ट ग्रेजुएशन करने हॉस्टल चली गई। फिर पीएचडी, नौकरी.. समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। वह शादी के बाद पति के साथ पहले विदेश चली गई फिर सिलिकॉन वैली, बंगलोर । मैं उत्तर भारत के दूसरे कोने मेें।। बस मिलना नहीं हो पाया।
मैंने उसे फोन पर मेरे पास ही रात रुकने को बोला था। वह मान नहीं रही थी फिर उसके पति को शादी के दिन छुपाए जूते ढूंढने मेें जो मदद की थी, याद दिलाई तो वह राज़ी हो गया। पांच साल की बेटी पति के पास ही छोड़ कर आ रही थी।
इतने में श्रुति ने दरवाज़ा नॉक किया और हम दोनों एक दूसरे के गले लग गईं। उसके पति बाहर से ही लौट गए रुके नहीं।  हम दोनों एक दूसरे को निहार रहीं थीं। वही गोरा  रंग, सुगठित देहयष्टि, हिरणी सी आंखें। लंबे बालों की जगह ब्लंट कट ने ले ली थी। श्रुति के रूप व सौंदर्य के कारण ही तो राहुल उस पर मर मिटा था। एक शादी के फंक्शन में उसे देखा और अगले दिन ही अपने माता पिता को भेज दिया था।
परन्तु  श्रुति कीआंखों मेें वह चमक ना दिखी। हम खाना खा कर पुरानी यादें ताज़ा कर रहीं थीं। श्रुति का मोबाइल बजा। राहुल था। उससे बात करने के बाद उसका चेहरा फीका पड़ गया। मेरे पूछने पर पहले तो टाल गई पर कुछ देर बाद पुराने स्नेहिल नाते ने उसके मन के कपाट खोल दिए।
"क्या बताऊं नीता, यह रूप रंग ही मेरा दुश्मन बन गया है। शादी के अगले दिन ही जब हम मायके फेरा डालने आए थे। घर जा कर राहुल ने इतनी तानाकशी की। तुम अपने कजिन्स से इतनी बेतकल्लुफ हो। फिर हनीमून पर भी यह मत पहनो वो मत पहनो। विदेश मेें रहते हुए मुझे कोई कोर्स कोई नौकरी नहीं करने दी। किसी पराए आदमी से बात भी कर लूं यह उनको गवारा नहीं। आज पता नहीं कैसे मान गया। अभी भी फोन पर कह रहा था, वही सहेली के साथ ही हो  या कोई और प्रोग्राम हैै," श्रुति के आंसू थम नहीं रहे थे।
मैं सन्न थी।  इतना पढ़ा लिखा आदमी और ऐसे टुच्चे विचार। शादी के इतने वर्ष बाद भी पत्नी के निष्कलंक हृदय को नहीं जान पाया। श्रुति अपना दिल हल्का करती रही। कैसे ऑफिस से भी फोन कर कर के टोह लेता रहता है। कभी अकेले शॉपिंग, सिनेमा तक भी जाने का सवाल नहीं। ऐसा तब जबकि पिछले दस साल मेें श्रुति ने कभी शक करने का कोई अवसर नहीं दिया।
   अगले दिन सुबह श्रुति वापस चली गई। कांफ्रेंस लंच के बाद मैंने भी वापिसी की फ्लाइट पकड़ ली। सारे रास्ते मेरे भीतर का मनोवैज्ञानिक राहुल के शक्कीपन के कारण का विश्लेषण करता रहा। पर असफल हो गया।
वापस लौट कर भी श्रुति की व्यथा मेरे मानसपटल पर छाई रही।
एक माह बाद अपने शहर जाना हुआ। मां की गोद मेें सिर रख कर बचपन जी रही थी कि बरबस श्रुति का जिक्र निकल आया। और राहुल का भी। अपने ही शहर का जो ठहरा।उसकी घटिया सोच और शक्की स्वभाव के बारे मेें मां को बताया। मां कुछ चुप हो गई। किसी की भी गॉसिप करनी उसके स्वभाव में नहीं है ।
   फिर कुछ रुक कर धीरे से बोली,"बचपन में इस लड़के ने घर में पता नहीं क्या कुछ देखा हैै। बिजनेस में आगे बढ़ने के लिए पिता का घर मेें अफसरों, दूसरी फर्मों के मालिकों को लाना, पीना पिलाना। उस आदमी ने अपनी पत्नी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया। और पैसों, ऐशोआराम, महंगे उपहारों के लिए उनकी बीवी ने भी पूरा साथ दिया। ऐसे माता पिता और ऐसे गन्दे माहौल में पला बढ़ा लड़का ना जाने कितनी ग्रन्थियां पाल बैठा हैै।"

ओह श्रुति ! मेरा मन चीत्कार कर रहा था। इतनी कुंठाओं और कॉम्प्लेक्स से भरे पति के मन में शक का यह ज़हर तो नासूर बन चुका है। शायद अब इसी के साथ जीना तुम्हारी नियति है।

Tuesday, October 6, 2020

बदलाव

 


हॉल से लगातार अमित व अदिति की चुहलबाज़ी की आवाज़ें आ रहीं थीं। साथ ही उसकी सास के ठहाके। अमित आज ऑफिस से जल्दी घर आ गए थे। मीनल रसोई में उन सब के लिए चाय बना रही थी। उसकी सास भीतर आकर साथ पकोड़े और सैंडविच का भी हुक्म दे गईं थी।
उसकी सास ही घर की कर्ता धर्ता थीं। प्रखर व्यक्तित्व, दबंग। पूरे परिवार पर उनका ही सिक्का चलता था। सोसायटी की किट्टी पार्टियों की रौनक थीं। ससुर शहर के नामी गिरामी वकीलों में गिने जाते थे। अमित भी पिता की लॉ फर्म मेें ही उनके सहायक के तौर पर कार्यरत था।
सात साल पहले वह मीनल को अपने मायके के कस्बे से ब्याह कर लाई थी। इक्कीस बरस की छुई मुई सी मीनल आठ वर्ष बड़े अमित के सामने बच्ची सी लगती थी। पिता बचपन मेें चल बसे थे। चार  भाई बहनों में सब से बड़ी थी। ईश्वर ने वह कमी अतीव सौन्दर्य देकर पूरी कर दी थी। किसी शादी के लिए मायके आई उसकी सास को उसके सादे लावण्य ने मोह लिया था।

परन्तु अब वह किसी को एक आंख नहीं भा रही थी। सात साल से उसकी गोद जो सूनी थी। नौबत धागे टोटकों मंत्र तंत्र तक आ गई थी।  घर मेें पंडितों,  स्वामियों व पूजा पाठ का सिलसिला चल निकला था। उसकी सास उसे लेकर कई  बार हस्पतालों के चक्कर लगा चुकी थी। आखिर अमित उनका इकलौता बेटा था।
सास ससुर के तेवर बदले हुए थे। अमित तो शुरू से ही "मामाज़ ब्वॉय" था। उसका खाना पीना, कपड़े सब उसकी सास ही तय करतीं।
एक महीने से उसकी सास की सहेली की बेटी अदिति उनके यहां रह रही थी। किसी नौकरी के सिलसिले मेें शहर आई थी और उसकी सास ने फ्लैट मिलने तक घर पर ही रोक लिया था। अमित भी उससे काफी घुल मिल गया था। उसकी सास इससे काफी प्रसन्न दिखती थीं।
मीनल का दिल सुबह से धड़क रहा था। उसके बार बार कहने पर कल अमित उसके साथ अपना टेस्ट करवा कर आया था। बहुत कठिनता से उसकी सास इसके लिए राज़ी हुई थी। मीनल के सारे टेस्ट ठीक होने के कारण डाक्टर का कहना मानना ही पड़ा था।
      इतने में फोन की घंटी बजी। हमेशा की तरह उसकी सास ने फोन उठाया। जब मीनल चाय और नाश्ता लेकर हॉल मेें आई तो वे वहां नहीं थीं। रात को डिनर टेबल पर भी नहीं आईं। मीनल ने उनके बेडरूम का दरवाजा खटखटा कर खाने को पूछा तो मना कर उसे लौटा दिया।
अगले दिन नहा धो, पूजा कर मीनल हॉल में आई तो देखा अदिति अटैची लिए तैयार खड़ी थी।
"वह कई दिनों से अपनी दोस्त के साथ शिफ्ट होना चाह रही थी। मैं ही रोक रही थी," उसके जाने के बाद सास ने सफाई सी दी।

मीनल किचन की ओर जाने लगी तो उसका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया और बोलीं,"बेटी मैं सोच रही थी क्यों ना तुम और अमित बच्चा गोद ले लो। मेरी बहुत जान पहचान हैै मै बात करुंगी । छोटा और दूधमुआ बच्चा घर में आ जाएगा तो घर मेें रौनक हो जाएगी।"
मीनल उनके बदले हाव भाव देख रही थी।

Monday, September 28, 2020

दूसरी औरत


पहली बार उसे देखा था जब समीर मुझे देखने मेरे घर आए थे। गोरा रंग, गहरा मेकअप, नाभि के नीचे बांधी साड़ी और फैशनेबल काले चश्मे में चहकती, वह समीर की बड़ी भाभी से ज़्यादा बोल रही थी। समीर से लगभग पांच वर्ष बड़ी होगी। पता चला उनकी कंपनी में काम करती है दिल्ली में। उन्हीं के शहर आगरा की है , वीक एंड पर आई हुईं थीं सो चाव चाव में साथ हो ली थीं।
      शादी के बाद जब दिल्ली आ गई तो वह घर पर कभी नहीं आई। एक दो बार मैंने समीर से पूछा भी तो कहने लगे उसके पति, बेटा व सास आगरा में ही रहते हैं सो वीक एंड पर घर चली जाती हैं।
         इक्कीस वर्ष की  भोली भाली मैं समीर के संग नए जीवन के ताने बाने बुनने में मस्त थी। एक  बार समीर की ऑफिस पार्टी में ज़िद करके उनके साथ चली गई तो देखा वो सेक्सी तंग मैक्सी में पार्टी में छाई हुई थी। बार बार समीर को डांस फ्लोर पर घसीट रही थी। मैं साड़ी में सकुचाई सी एक ओर खड़ी थी कि समीर की एक दो सहयोगी लड़कियां मुझ से बतियाने लगीं। उनकी नजरें भी उन दोनों पर ही थीं। 
"आजकल समीर और मीरा कांफ्रेंसों में भाग लेनें नहीं जा रहे हर जगह, शुक्र है हमें भी अवसर मिल रहा है," एक ने कुटिल मुस्कान से कहा। तो दूसरी ने उसे कुहनी मारी और दोनों वहां से खिसक लीं थीं।
मेरा पत्नी का रडार एकदम खड़ा हो गया था। अब समझ आने लगा था कि क्यों समीर रात नौं बजे से पहले "ऑफिस से" घर नहीं आते। फोन पर पास वर्ड रहता है और रात को घंटी बजते ही वे "ओवरसीज ऑफिस से कॉल है" कह के दूसरे कमरे में चले जाते हैं।
घर लौट कर मैंने कुछ नहीं कहा। सोचती रही । मुझ में क्या कमी है। सुन्दर हूं। पढ़ी लिखी हूं। उम्र भी मेरे साथ है। क्या मैं अपने पति का दिल नहीं जीत सकती। 
पहले अपनी वॉर्डरोब बदल दी। समीर के उठने से पहले ही स्मार्ट ट्रैक सूट में जॉगिंग करके लौटती और बढ़िया ब्रेकफास्ट तैयार रखती। उससे शाम को जल्दी आने का आग्रह करती। और हर बार कोई ना कोई सरप्राइज तैयार रखती..अपने कपड़ों का , खाने पीने का। और शाम को रोमांटिक माहौल..। समीर धीरे धीरे  प्यार में डूबते चले गए.....।
काकपिट से हवाई जहाज के पायलट की घोषणा हो रही थी। जहाज थोड़ी देर में सिडनी लैंड करने वाला था। मंडे को समीर कम्पनी के सिडनी ऑफिस को ज्वाइन कर रहे थे। मैंने हल्के से उनके कंधे पर सिर रख दिया।
हमारा नया जीवन हमारी प्रतीक्षा कर रहा था।

Sunday, September 27, 2020

उम्रकैद


कॉलेज कैंटीन के सामने वाले लान में बैठी मैं चाय के सिप ले रही थी कि सुरजीत कौर आती दिखाई दी।

 "अरे आओ आओ। मिठाई का डिब्बा कहाँ है?" मैने उसका स्वागत करते हुए कैंटीन वाले को चाय लाने को कहा।

सुरजीत आके धम्म से बैठ गई। चेहरे पर खिन्नता और उदासी झलक रही थी। वह आज ही सप्ताह के बाद लौटी  है। छुट्टी लेकर गांव गई थी अपनी भतीजी की शादी पर। विवाह के दस साल के बाद भी अपनी कोई  संतान नही। भतीजी उसे बेटी से बढ़ कर प्रिय थी। दो साल पहले उसी के पास रह कर उसने इसी कॉलेज से बीकॉम की थी। फिर उसे आगे पढ़ने के लिए शहर भी उसी ने भेजा । बड़े भाई गांव में खेती करते हैं। सुरजीत के बाद वह पहली लड़की है जो इतना पढ़ लिख गई है।

  "काहे की मिठाई ," सुरजीत ने सिर झुका लिया।

"अरे क्या हुआ? क्या शादी टूट गई?"मैंने घबरा कर पूछा। सुरजीत कुलीग होने के साथ अंतरंग मित्र भी है। जाने से पहले भी काफी अनमनी सी थी पर मैं कुछ पूछ नहीं पाई थी।

"क्या कहूं! सिमरन यहां आने से पहले से ही गांव में स्कूल के एक लड़के के संपर्क में आ गई थी। यहां तीन साल में भी व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर उससे जुड़ी रही। वह उससे मिलने हमारी जानकारी के बिना यहां भी आता रहा। जब वह CA करने  शहर गई तो वहां भी पहुंच जाता था। खुद तो बाहरवी के बाद पढ़ा नहीं। बाप की जमीनों पर ऐश करता है। बुरी आदते हैं। सिमरन ने जब उससे पीछा छुड़ाना चाहा तो  सारे वीडियो, तस्वीरें लेकर  भाई साहिब के पास पहुंच गया...।

"लड़की और परिवार की इज्जत के लिए उसी निकम्मे आवारा से शादी करके आएं है। सिमरन रोती पछताती विदा हो गई। यह शादी थोड़ी थी ..यह उम्रकैद है उम्रकैद।" सुरजीत के आंसू बह रहे थे।


Saturday, September 26, 2020

गुलाबो

               गुलाबो


शाम होने को आई और सुनीता वैसे ही सोफे पर अधलेटी पड़ी थी। घर भी बिखरा पड़ा था। दोपहर को भी ना कुछ पकाया ना खाया। सुमित सुबह टूर पर चला गया। कल लौटेगा। 

प्रेम विवाह किया था उसने। सुमित के सिविल सर्विस में चुने जाने पर लोकल कॉलेज की नौकरी भी छोड़ दी थी । यहां वहां ट्रांसफर जो होती रहती थी। चपरासी से कोई घर का काम नहीं करवाती थी। सुमित के लिए उसकी पसंद का खाना बनाना उसे भाता था। स्वयं को पति घर गृहस्थी के लिए समर्पित कर दिया था।

रात व्हिस्की कुछ ज़्यादा हो गई थी। उसके टोकने पर सुमित गालियां बकने लगा। इतने पढ़े लिखे सरकारी अफसर के मुंह से इतना गंद। बिना खाए लेट गया। फिर उसका मन ना होने पर भी... ज़बरदस्ती...। अब अक्सर ऐसा होने लगा है। कुछ दिन पहले तो उसने उस पर हाथ भी उठा दिया था।

उसे अपने आप से घृणा होने लगी। एक अजीब सी वितृष्णा.. असहायता।

अगले दिन सुबह सुनीता नहा धो कर किचन में नाश्ता बना रही थी । घंटी बजी ।दरवाज़ा खोला तो देखा निर्मला है। उसके यहां बर्तन, सफाई करती है। दो दिन से आई नहीं थी। बेचारी बहुत ही बदकिस्मत है। चार बच्चे हैं, तीन लड़कियां और एक सबसे छोटा लड़का। पति नशाखोर है। जो कमाता है सब नशे के निमित्त कर देता है। एक पैसा कभी घर खर्चे के लिए नहीं दिया। जब मांगती है तो वही लातखोरी, गाली गलौज। झोपड़ पट्टी में रहते हुए चार चार घरों में काम करके जैसे तैसे घर चला रही है बेचारी।
"क्या बात हुई निर्मला तुम दो दिन से आई नहीं?"
निर्मला ने साड़ी का पल्लू सरका कर दिखाया। उसकी गर्दन पर नीले निशान थे। आंख के पास भी नील ।
"दीदी परसों मूएं ने बहुत मारा। पता नहीं सर पर क्या सवार था। बिना बात के मेरा गला पकड़ लिया। ज़ोर ज़ोर से मुझ पर गन्दे इल्ज़ाम लगाने लगा। तीन तीन बेटियों की मां हूं। इतनी बेइज्जती। रात भर सिसकती रही...। 
कल सुबह सीधी पुलिस चौकी गई। वहां साहब ने कहा तू मार क्यों खाती है। तुझ में जान नहीं है। दिखा दे उसको घर में मर्द कौन है। हम तेरे साथ हैं। बस घर आकर मैंने कपड़े धोने का डंडा उठा लिया।  दो डंडे नशेड़ी की पीठ पर धरे और उसे साफ कह दिया कि रहना तो इन्सानों की तरह रह वरना निकाल बाहर करुंगी।  तब से भीगी बिल्ली बना बैठा है।" निर्मला गर्व से बोली और पल्लू कमर में ठूंस बर्तन साफ करने लगी।
सुनीता जड़वत खडी़ रह गई। उसे लगा सामने निरीह निर्मला नहीं, गुलाबी गैंग की गुलाबो खड़ी है।

Friday, September 18, 2020

उनसे पूछो...

 

कुछ माह की नकाब ने हमें गाफिल कर दिया
उनसे पूछो जो सदियों से बुर्कों में बन्द हैं

कुछ माह की तालाबंदी से हम बेज़ार हो लिए
उनसे पूछो जिनके हलफ दूसरों के पाबंद हैं

कुछ माह से दोस्तों की महफिलें नाबाद हैं
उनसे पूछो जो तन्हाइयों की कैद मेंआबाद हैं

कुछ माह से महफिलें ज़ूम तक नज़रबंद हैं

उनसे पूछो जिनके चूल्हे रोजी बिन मंद हो गये

कुछ माह की तमाम बन्दिशों से परेशां हो गए
उनसे पूछो जिनके अपने चिर निंद्रा में सो गए।

Thursday, September 17, 2020

अंकल



                                                           अंकल                                    



 दरवाज़े की घंटी बजी। आंटी नहा कर निकली ही थीं सो मैं लपक कर गई। पीप होल से देखा एक सूटेड बूटेड अंकल खड़े हैं। आँखों पे काला चश्मा, उंगली पर कार की चाभी घुमा रहे हैं। मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो मुझे देख कर सकपका गए। तभी आंटी ब्लाउज पेटीकोट में ही लिविंग रूम में आ गईं। 

"आओ बैठो। यह मेरी कजिन की बेटी हैं।कोई एंट्रेंस एग्जाम देने आई है", वही खड़े खड़े हाथ में पकड़ी साड़ी लपेटते हुए उन्होंने परिचय करवाया।

अंकल ज़्यादा देर बैठे नहीं। चाय पी और उठ खड़े हुए। दरवाज़ा बन्द करते हुए मैंने देखा बाहर कार  थी नही। थोड़ा आगे जा कर देखा कार तीन कोठियां छोड़ कर खडी़ थी। 

"हमारे बहुत पुराने पारिवारिक फ्रेंड्स हैं।  तुम एग्जाम दे लो। उनके यहां ले चलूंगी। बहुत बड़ा सरकारी बंगला मिला हुआ है",   आंटी ने बताया।

आंटी के पति भी बड़े अफसर थे। बहुत साल पहले कार एक्सीडेंट में चल बसे। एक बेटा है विदेश में नौकरी कर रहा है। गोरी चिट्टी, कटे बाल, फर्राटे दार इंग्लिश बोलतीं है। पूरे शहर में कार चला लेती हैं। पैसे की कोई कमी नहीं। मुझ जैसी छोटे से शहर में रहने वाली बाहरवी पास लड़की को तो वे आईडल ही लगती हैं।

मेरा पेपर हो गया। आगे वीक एंड था। दस बजे आंटी कहने लगीं,"चलो उनके घर चलते हैं उस साइड मुझे कुछ काम भी है।"

रास्ते में बोलीं," वहां ज़्यादा बातें मत करना।" कम्पाऊण्ड में कार खडी़ कर अन्दर घुसे। उनका अर्दली लॉबी में ले गया अंकल एक सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनकी पत्नी ने स्वागत किया और ड्राइंग रूम में ले चली। 

अंकल ने हमें देख कर भी अनदेखा सा कर दिया। मेरी नमस्ते के उत्तर में हल्का सा सिर हिलाया और वापिस अखबार पढ़ने लग गए। आंटी को तो उन्होंने बुलाया तक नहीं। मुझे बहुत बुरा सा लगा।

 उनकी पत्नी ने चपरासी को चाय लाने को कहा। बार बार पति की बहुत बिज़ी लाइफ और जिम्मेदारियों की ही बातें सुनाती रही। एकाध घंटे बाद हम वापस आने लगे तो अंकल लॉबी में नहीं थे।

  मैं वापिसी में अजीब सा महसूस कर रही थी। पर आंटी की आंखो में अजीब सी चमक थी। कहने लगीं,"देखा कितनी मुरझाई सी लगने लगी है इन्दु। मुझसे छोटी होगी पर कितनी अधेड़ सी लग रही थी।"



Sunday, September 13, 2020

प्रश्न


 

प्रश्न

मैं कॉलेज में  सबसे ऊपर की मंजिल के लंबे कॉरिडोर में अण्ने विभाग की ओर जा रही थी तो देखा एक प्रोफेसर ज़ोर ज़ोर से किसी लड़की को डांट रही है। लड़की छुई मुई सी खडी़ थी। गोरा रंग, पोनी टेल, सिम्पल सा सूट और भोला सा चेहरा।
"क्या हुआ," मैंने पूछा।
मैडम क्रोध से चिल्लाई, "यह ख़ाली लेक्चर हाॅल के बाहर पहरा दे रही थी और अंदर एक लड़का लड़की चिपटा चिपटी कर रहे थे। वो कमबख्त तो भाग गए। अब यह उनकी क्लास और नाम बता नहीं रही।"
उन दिनों कॉलेज का चार्ज मेरे पास था। दोनो को मैंने ऑफिस में बुला लिया। लड़की अभी बीए प्रथम वर्ष में ही आई थी। सीमा नाम था। बार बार दोहरा रही थी कि वह उनको नहीं जानती। थोड़ा समझा बुझा कर मैंने उसे जाने दिया। तो मैडम कहने लगी,"मैडम आप नहीं जानती यह दिखती भोली है...।" खैर बात आई गई हो गई।
फर्स्ट ईयर की वेलकम पार्टी में उसे फिर से देखा। स्टेज पर हाथ में डायरी लिए स्वरचित कविताएं सुनाते हुए। बाद में मैंने उसे अपने पास बुलाया था। "बेटा तुम तो बहुत अच्छा लिखती हो पर सब इतना उदास क्यों। खुशी के गीत गाया करो। यू आर सो यंग।"
फिर एक दिन स्टाफ रूम में आई तो वोही मैडम हाथ नचा कर कुछ बोल रही थी। मुझे देखते ही कहने लगीं,"अरे मैडम उसी सीमा के किस्से सुना रही हूं। अाप को बड़ी भोली लगती थी ना। आजकल लड़के लड़कियां उसे चने के झाड़ पे चढ़ा कर खूब यूज कर रहे हैं। कभी किसी ग्रुप के साथ बैठी होती है कभी किसी। क्लास में आती नहीं। मै तो इसके लेक्चर शॉर्ट कर दूंगी।"
साल बीत चला था। फेयरवेल पार्टी वाले दिन देखा सीनियर्स उसे स्टेज पर  बार बार चढा कर उसका मज़ाक बना रहे थे। वैसे भी इस दिन विद्यार्थियों को कंट्रोल करना काफ़ी कठिन हो जाता है।
      ग्रीष्मावकाश के बाद आज कॉलेज खुला है। नयी एडमिशन की तैयारी चल रही है। स्टाफ रूम में आई तो देखा कि सबके चेहरों पर उदासी थी।
"वह सीमा लड़की थी ना फर्स्ट ईयर में! उसने परसों  सुसाइड कर लिया।  परसों ही रिजल्ट निकला था। फेल हो गई थी। पता चला है कि मां पागल है और बाप एक दर्जे का शराबी। कोई भार्इ बहन भी नही। बस गेहूं में डालने वाली गोलियां खा लीं।"एक प्रोफेसर ने बताया।
मै सन्न थी। बेचारी लड़की । मुझे समझ जाना चाहिए था। अंतरंगता की तलाश में भटकती रही। उसकी मनोदशा, उसकी मानसिकता को कोई समझ नहीं पाया। किसी ने कोशिश ही नहीं की। ना उसके सहपाठियों ने ना हम अध्यापकों ने। क्या अध्यापन केवल किताबों तक ही सीमित है? क्या उसे बुला कर काउंसलिंग नहीं करनी चाहिए थी?


यह प्रश्न मुझे जीवन भर झकझोरते रहेंगे।

Friday, September 11, 2020

बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

 

लोग बहरे हैैं इन्हें दिल की सुनाया न करो
बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

तेज़ हवा के झोंके से मिट जायेगी
रेत पे मेरी तस्वीर बनाया ना करो

उठ आए जो इस पार कभी लौटते नहीं
तन्हा बैठ के हमें बुलाया ना करो

यादों की धूल झाड़ कर उजाला करलो
उदासी के अंधेरों में खो जाया ना करो

गत जीवन की खुशियां पिरो लो मन में
नम आंखों से झूठा मुस्कराया ना करो

मिलेंगे उस पार वादा है मेरा तुमसे
फूंक फूंक के दिल को यूं जलाया ना करो

लोग बहरे हैैं इन्हें दिल की सुनाया न करो
बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

दूसरी शादी

 

       


उस के हाथ में फोन था पर डायल करने में उसके हाथ कांप रहे थे। भरी हुई आंखों के आगे सब कुछ चलचित्र सा घूम रहा था..।


           पांच साल हुए बस एक्सीडेंट में पति चल बसे थे।  तीन साल की बच्ची और बूढ़े ससुर, घर में तीन ही जी रह गए थे। प्राइमरी स्कूल के साथ लगती गली की नुक्कड़ पे छोटा सा तीन मंजिला मकान था। सबसे नीचे कापियों किताबों की दुकान, उसके ऊपर बाथरूम व दो छोटे कमरे जहां ससुर दिन भर अपने काढ़े कुश्ते बनाते खाते पड़े रहते और ऊपर उसका कमरा और रसोई। बस इन्हीं में उतरते चढते जीवन बीत रहा था। 


पहले साल मायके में माँ ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर डाला था। परंतु वह खुद को पति की यादों से अलग नहीं कर पाई थी। अकेले रिटायर ससुर को कौन देखेगा का तर्क भी़ था।। फिर अगले वर्ष मां भी चल बसी थी। भाई बहन अपने अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। समय निकलता गया। 


पिछले छह माह से उसकी कॉलेज की पुरानी सहेली बार बार फोन करके उसे समझाने की कोशिश कर रही थी़। उसका देवर अपनी पत्नी को एक हादसे मे खो बैठा था। दो साल का बेटा बिना मां का हो गया था। मगर  वह मन नहीं बना पाई थी। स्वर्गीय पति के प्रति समर्पण व पारिवारिक जिम्मेदारी की भावना आड़े आ जाती।


बरस भर से भाभी ने चौदह पन्द्रह बरस का भांजा भेज दिया था। वह दुकान पर मदद कर देता। साथ में प्राइवेट मैट्रिक की पढ़ाई कर रहा था। बेटी अब तीसरी कक्षा में आ गई थी़। तीनों रात को कुछ देर टीवी देखते फिर वहीं सो जाते। 


आज जब रात के खाने के बाद सोने से पहले ससुर को दूध का गिलास दे कर आने लगी तो उन्होंने रोक लिया। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे और आंखों में अजीब सी चमक। वह झपट कर वापस जाने लगी तो पीछे से वो फुसफुसाए," मर्द के घर में होते हुए  छोकरे के साथ...।"आगे  और कुछ सुनने से पहले वह लपक कर सीढ़ियां चढ़ आई।


कांपते हाथ से उसने नंबर घुमाया। सहेली की हैलो सुनते ही  सिसक कर बोली, "मैं तैयार हूं।"

Wednesday, September 9, 2020

दुआ


उनके जाने के बाद...


जो सांसे उनकी सोहबत में चलती थीं
तन्हाई के शोर में गुमसुम सी हैं

जो बातें उनकी गुफ्तगू में सुनते थे
खामोशी में एहसास का गुंजन भर हैं

उनकी नजदीकियां जो कभी आसपास थीं
अब ख्वाबों की ताबीर में ढूंढते हैं

उनकी जुदाई ने इबादत सिखा दी
वरना हम तो संग की खुशी में काफ़िर बने बैठे थे

जिस खुदा ने मेरी किस्मत से बेदखल कर दिया उनको
हर जनम में वो साथ हों उससे यह इज़हार करते हैं

अगले जहां में मिलने की दुआ है अब
ज़िन्दगी को उसके कबूल होने का इंतजार कहते है।