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Friday, March 12, 2021

Thought For Today : हमारे जीवन में डर की भूमिका

 


डर अथवा भय एक ऐसी भावना है जो अप्रिय होते हुए भी  प्रत्येक जीवित प्राणी में अपरिहार्य रूप से मौजूद रहती है। कई वन्य जीवों के लिए तो यह जीवन प्रवृत्ति है। हम मानवों के जीवन का भी यह अभिन्न अंग है।  जीवन पर्यन्त हम किसी न किसी डर से जीते हैं। बचपन व किशोरावस्था में परीक्षा का, परिणाम का डर, कई प्रकार के पियर प्रेशर हमे भयभीत किए रहते हैं। हमारे समस्त जीवन में सब से बड़ा डर जो हमें घेरे रहता है वह है समाज का डर। लोग क्या कहेंगे! यह डर हमारे जीवन के कई महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करता है। इस डर से कई बार हम हमारे जीवन के दूसरे अति प्रिय संबंधों की भी उपेक्षा कर देते हैं। जबकि हमें अपनें व अपने परिवारजनों के वर्तमान अथवा भविष्य को समाज के डर पर प्राथमिकता देनी चाहिए।
जीवन के एक पड़ाव पर हमें मृत्यु का डर भी सताने लगता है। यद्यपि उससे डरने की अपेक्षा हमें इसे शाश्वत सत्य जान कर परम विश्राम का पड़ाव समझना चाहिए।
हमें डर को सकारात्मक ऊर्जा के रूप में लेना चाहिए। कई बार डर हमारे भीतर नई चेतना, स्फूर्ति व जागृति उत्पन्न कर देता है जो हमारे जीवन को नए आयाम दे सकते हैं।


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