Pages

Thursday, September 17, 2020

अंकल



                                                           अंकल                                    



 दरवाज़े की घंटी बजी। आंटी नहा कर निकली ही थीं सो मैं लपक कर गई। पीप होल से देखा एक सूटेड बूटेड अंकल खड़े हैं। आँखों पे काला चश्मा, उंगली पर कार की चाभी घुमा रहे हैं। मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो मुझे देख कर सकपका गए। तभी आंटी ब्लाउज पेटीकोट में ही लिविंग रूम में आ गईं। 

"आओ बैठो। यह मेरी कजिन की बेटी हैं।कोई एंट्रेंस एग्जाम देने आई है", वही खड़े खड़े हाथ में पकड़ी साड़ी लपेटते हुए उन्होंने परिचय करवाया।

अंकल ज़्यादा देर बैठे नहीं। चाय पी और उठ खड़े हुए। दरवाज़ा बन्द करते हुए मैंने देखा बाहर कार  थी नही। थोड़ा आगे जा कर देखा कार तीन कोठियां छोड़ कर खडी़ थी। 

"हमारे बहुत पुराने पारिवारिक फ्रेंड्स हैं।  तुम एग्जाम दे लो। उनके यहां ले चलूंगी। बहुत बड़ा सरकारी बंगला मिला हुआ है",   आंटी ने बताया।

आंटी के पति भी बड़े अफसर थे। बहुत साल पहले कार एक्सीडेंट में चल बसे। एक बेटा है विदेश में नौकरी कर रहा है। गोरी चिट्टी, कटे बाल, फर्राटे दार इंग्लिश बोलतीं है। पूरे शहर में कार चला लेती हैं। पैसे की कोई कमी नहीं। मुझ जैसी छोटे से शहर में रहने वाली बाहरवी पास लड़की को तो वे आईडल ही लगती हैं।

मेरा पेपर हो गया। आगे वीक एंड था। दस बजे आंटी कहने लगीं,"चलो उनके घर चलते हैं उस साइड मुझे कुछ काम भी है।"

रास्ते में बोलीं," वहां ज़्यादा बातें मत करना।" कम्पाऊण्ड में कार खडी़ कर अन्दर घुसे। उनका अर्दली लॉबी में ले गया अंकल एक सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनकी पत्नी ने स्वागत किया और ड्राइंग रूम में ले चली। 

अंकल ने हमें देख कर भी अनदेखा सा कर दिया। मेरी नमस्ते के उत्तर में हल्का सा सिर हिलाया और वापिस अखबार पढ़ने लग गए। आंटी को तो उन्होंने बुलाया तक नहीं। मुझे बहुत बुरा सा लगा।

 उनकी पत्नी ने चपरासी को चाय लाने को कहा। बार बार पति की बहुत बिज़ी लाइफ और जिम्मेदारियों की ही बातें सुनाती रही। एकाध घंटे बाद हम वापस आने लगे तो अंकल लॉबी में नहीं थे।

  मैं वापिसी में अजीब सा महसूस कर रही थी। पर आंटी की आंखो में अजीब सी चमक थी। कहने लगीं,"देखा कितनी मुरझाई सी लगने लगी है इन्दु। मुझसे छोटी होगी पर कितनी अधेड़ सी लग रही थी।"



No comments:

Post a Comment