गुलाबो
शाम होने को आई और सुनीता वैसे ही सोफे पर अधलेटी पड़ी थी। घर भी बिखरा पड़ा था। दोपहर को भी ना कुछ पकाया ना खाया। सुमित सुबह टूर पर चला गया। कल लौटेगा।
प्रेम विवाह किया था उसने। सुमित के सिविल सर्विस में चुने जाने पर लोकल कॉलेज की नौकरी भी छोड़ दी थी । यहां वहां ट्रांसफर जो होती रहती थी। चपरासी से कोई घर का काम नहीं करवाती थी। सुमित के लिए उसकी पसंद का खाना बनाना उसे भाता था। स्वयं को पति घर गृहस्थी के लिए समर्पित कर दिया था।
रात व्हिस्की कुछ ज़्यादा हो गई थी। उसके टोकने पर सुमित गालियां बकने लगा। इतने पढ़े लिखे सरकारी अफसर के मुंह से इतना गंद। बिना खाए लेट गया। फिर उसका मन ना होने पर भी... ज़बरदस्ती...। अब अक्सर ऐसा होने लगा है। कुछ दिन पहले तो उसने उस पर हाथ भी उठा दिया था।
उसे अपने आप से घृणा होने लगी। एक अजीब सी वितृष्णा.. असहायता।
अगले दिन सुबह सुनीता नहा धो कर किचन में नाश्ता बना रही थी । घंटी बजी ।दरवाज़ा खोला तो देखा निर्मला है। उसके यहां बर्तन, सफाई करती है। दो दिन से आई नहीं थी। बेचारी बहुत ही बदकिस्मत है। चार बच्चे हैं, तीन लड़कियां और एक सबसे छोटा लड़का। पति नशाखोर है। जो कमाता है सब नशे के निमित्त कर देता है। एक पैसा कभी घर खर्चे के लिए नहीं दिया। जब मांगती है तो वही लातखोरी, गाली गलौज। झोपड़ पट्टी में रहते हुए चार चार घरों में काम करके जैसे तैसे घर चला रही है बेचारी।
"क्या बात हुई निर्मला तुम दो दिन से आई नहीं?"
निर्मला ने साड़ी का पल्लू सरका कर दिखाया। उसकी गर्दन पर नीले निशान थे। आंख के पास भी नील ।
"दीदी परसों मूएं ने बहुत मारा। पता नहीं सर पर क्या सवार था। बिना बात के मेरा गला पकड़ लिया। ज़ोर ज़ोर से मुझ पर गन्दे इल्ज़ाम लगाने लगा। तीन तीन बेटियों की मां हूं। इतनी बेइज्जती। रात भर सिसकती रही...।
कल सुबह सीधी पुलिस चौकी गई। वहां साहब ने कहा तू मार क्यों खाती है। तुझ में जान नहीं है। दिखा दे उसको घर में मर्द कौन है। हम तेरे साथ हैं। बस घर आकर मैंने कपड़े धोने का डंडा उठा लिया। दो डंडे नशेड़ी की पीठ पर धरे और उसे साफ कह दिया कि रहना तो इन्सानों की तरह रह वरना निकाल बाहर करुंगी। तब से भीगी बिल्ली बना बैठा है।" निर्मला गर्व से बोली और पल्लू कमर में ठूंस बर्तन साफ करने लगी।
सुनीता जड़वत खडी़ रह गई। उसे लगा सामने निरीह निर्मला नहीं, गुलाबी गैंग की गुलाबो खड़ी है।
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