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Sunday, September 13, 2020

प्रश्न


 

प्रश्न

मैं कॉलेज में  सबसे ऊपर की मंजिल के लंबे कॉरिडोर में अण्ने विभाग की ओर जा रही थी तो देखा एक प्रोफेसर ज़ोर ज़ोर से किसी लड़की को डांट रही है। लड़की छुई मुई सी खडी़ थी। गोरा रंग, पोनी टेल, सिम्पल सा सूट और भोला सा चेहरा।
"क्या हुआ," मैंने पूछा।
मैडम क्रोध से चिल्लाई, "यह ख़ाली लेक्चर हाॅल के बाहर पहरा दे रही थी और अंदर एक लड़का लड़की चिपटा चिपटी कर रहे थे। वो कमबख्त तो भाग गए। अब यह उनकी क्लास और नाम बता नहीं रही।"
उन दिनों कॉलेज का चार्ज मेरे पास था। दोनो को मैंने ऑफिस में बुला लिया। लड़की अभी बीए प्रथम वर्ष में ही आई थी। सीमा नाम था। बार बार दोहरा रही थी कि वह उनको नहीं जानती। थोड़ा समझा बुझा कर मैंने उसे जाने दिया। तो मैडम कहने लगी,"मैडम आप नहीं जानती यह दिखती भोली है...।" खैर बात आई गई हो गई।
फर्स्ट ईयर की वेलकम पार्टी में उसे फिर से देखा। स्टेज पर हाथ में डायरी लिए स्वरचित कविताएं सुनाते हुए। बाद में मैंने उसे अपने पास बुलाया था। "बेटा तुम तो बहुत अच्छा लिखती हो पर सब इतना उदास क्यों। खुशी के गीत गाया करो। यू आर सो यंग।"
फिर एक दिन स्टाफ रूम में आई तो वोही मैडम हाथ नचा कर कुछ बोल रही थी। मुझे देखते ही कहने लगीं,"अरे मैडम उसी सीमा के किस्से सुना रही हूं। अाप को बड़ी भोली लगती थी ना। आजकल लड़के लड़कियां उसे चने के झाड़ पे चढ़ा कर खूब यूज कर रहे हैं। कभी किसी ग्रुप के साथ बैठी होती है कभी किसी। क्लास में आती नहीं। मै तो इसके लेक्चर शॉर्ट कर दूंगी।"
साल बीत चला था। फेयरवेल पार्टी वाले दिन देखा सीनियर्स उसे स्टेज पर  बार बार चढा कर उसका मज़ाक बना रहे थे। वैसे भी इस दिन विद्यार्थियों को कंट्रोल करना काफ़ी कठिन हो जाता है।
      ग्रीष्मावकाश के बाद आज कॉलेज खुला है। नयी एडमिशन की तैयारी चल रही है। स्टाफ रूम में आई तो देखा कि सबके चेहरों पर उदासी थी।
"वह सीमा लड़की थी ना फर्स्ट ईयर में! उसने परसों  सुसाइड कर लिया।  परसों ही रिजल्ट निकला था। फेल हो गई थी। पता चला है कि मां पागल है और बाप एक दर्जे का शराबी। कोई भार्इ बहन भी नही। बस गेहूं में डालने वाली गोलियां खा लीं।"एक प्रोफेसर ने बताया।
मै सन्न थी। बेचारी लड़की । मुझे समझ जाना चाहिए था। अंतरंगता की तलाश में भटकती रही। उसकी मनोदशा, उसकी मानसिकता को कोई समझ नहीं पाया। किसी ने कोशिश ही नहीं की। ना उसके सहपाठियों ने ना हम अध्यापकों ने। क्या अध्यापन केवल किताबों तक ही सीमित है? क्या उसे बुला कर काउंसलिंग नहीं करनी चाहिए थी?


यह प्रश्न मुझे जीवन भर झकझोरते रहेंगे।

4 comments:

  1. Reality check indeed! We should try to be more empathetic.Interesting read👍

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  2. A great eye-opener; you have written it so well that one can visualise the story! You are an awesome writer!!
    The story teaches a great lesson - we shouldn’t judge people because we don’t know what they might be going through!

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