घर में उत्सव सा माहौल था। पाँच साल बाद बेटा बहू अमरीका से आ रहे थे। वो भी़ अकेले नहीं, दो दो नातियों के साथ। चार साल का पोता और डेढ़ वर्ष की नन्हीं पोती। अमरीक सिंह और पत्नी दर्शन कौर के साथ साथ बूढ़े दादा दादी भी फूले नहीं समा रहे थे।
गांव का सबसे होनहार लड़का था उनका अजीत। बाहरवी में 97 प्रतिशत नंबर लेकर इंजीनियरिंग कॉलेज चला गया था। फिर एमएनसी मे प्लेसमेंट पाकर तीन साल में ही अमरीका। वहीं उसकी कम्पनी में ही काम कर रही सुनीता से शादी पक्की कर ली थी़। उस का परिवार जो पास के शहर का ही था भी़ खुशी से राज़ी हो गया था। बस दोनो पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर आए थे। हफ्ते बाद शादी और तीन चार दिन बाद ही बेटा बहू शहर मिलने मिलाने चले गए, वहीं से दिल्ली एयरपोर्ट और वापस अमरीका। यूं ही पांच साल निकल गए थे।
"अरे मेरा परपोता आ रहा है। हम दोनो को तो सोने की पौड़ी (सीढ़ी) पड़ेगी। मै तो अपने हाथों से चूरी खिलाऊंगी उसे,"अजीत की दादी ना जाने कितनी बार दोहरा चुकी थी। दर्शन कौर मुस्करा कर बोली,"मैंने तो उसके लिए पड़ोस की बेबी की मदद से कुकर में केक बनाया है। देखें क्या खाता है चूरी या केक।"
शाम को टैक्सी आकर रूकी। दरवाजे पर तेल चू कर बच्चाें को अन्दर लाया गया। गांव की औरतों ने शादी जैसा माहौल बना डाला। दोनो बच्चे मम्मी पापा की गोद में थे। उन्हें देख कर दर्शन कौर और दादी के आँसू नहीं सूख रहे थे। थोड़ी देर बाद उन्होंने पोते को गोद में लेना चाहा तो वह सहम कर अपने पापा के कंधे से लग गया। नन्हीं पोती सोई हुईं थी़।
रात को अजीत के बहुत कहने पर पोता दर्शन कौर की गोद में आ गया। वह उससे तोतली भाषा में बतियाने लगी। पर बच्चा बिलकुल कुछ समझ नहीं पा रहा था। वो कभी उसके मुंह की ओर देखता कभी अपने माँ बाप की ओर। कुछ ना समझ पाने के कारण वो उसकी गोद में तिलमिलाने लगा और उठ कर अपनी मम्मी के पास चला गया।
"आप लोगों ने बच्चे को अपनी भाषा बिलकुल नहीं सिखाई," दर्शन कौर हतप्रभ थी। "हम तो इससे बात ही नहीं कर पा रहे। हमारी तो तमन्ना दिल में ही रह गई अपने पोते से मीठी मीठी बातें करने की। उसकी प्यारी बातें सुनने की।"
"मैंने कई बार कहा भी़....," अजीत ने सुनीता की ओर देखा और चुप हो गया।
"अब दस पन्द्रह दिन के लिए कौन माथा पच्ची करता। वहां तो हम यहां की बोली बोलते नहीं", सुनीता ने तुनक कर जवाब दिया और बेटे का हाथ पकड़ कर अन्दर सोने चली गई।
बूढ़े दादा दादी और दर्शन कौर निस्तब्ध थे।

Aww..so important to be rooted and give the same to our kids.
ReplyDeleteThanks shelly
DeleteLovely!! Keep writing!
ReplyDeleteLovely! It is in fact a bitter reality of our generation.Grand parents can’t have any connection with their grand children as the common language is the barrier.
ReplyDeleteYes exactly
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