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Saturday, September 5, 2020

स्त्री सशक्तीकरण

   स्त्री सशक्तीकरण




बस ठसाठस भरी हुई थी़। जितने लोग बैठे थे उतने खड़े भी थे। गर्मी और उमस से माथा भुनभुना रहा था। मै ड्राइवर की पिछली सीट पर खिड़की से लगी बैठी थी। यूनिवर्सिटी में स्त्री सशक्तीकरण पर सेमिनार अटैंड करके लौट रही थी। ट्रेन मिस हो जाने के कारण लोकल बस लेनी पड़ी थी।

 बस हर दस मिनट के बाद रुक जाती प्राइवेट होने के कारण कंडक्टर हर स्टॉप पर सवारी उठा रहा था। इतने मे फिर किसी स्टॉप पर बस रुकी और कंडक्टर चिल्लाने लगा,"जल्दी उतरो भई और लोगो को भी चढ़ने दो" 

अचानक उतरने को उन्मुखखड़ी हो सवारी कर रही एक औरत ने सामने की सीट पर बैठे मोटे तगड़े फौजी से लगने वाले व्यक्ति को एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया। साथ ही चिल्लाई,"इसने मुझे आंख मारी है। मुर्दुआ आधे घण्टे से घूर रहा था।"

औरत पैंतीस के आसपास की रही होगी। हट्टी कट्टी पंजाबन, गहरे रंग का फूलों का कढ़ाई दार सूट, लाल लिपस्टिक और काला चश्मा। रास्ते मे किसी गांव से चढी थी। सारी बस में सन्नाटा सा छा गया। 

उसे थप्पड़ दिखाते हुए फौजी ने गन्दी गाली बकी और चीखा, "तुझे और आंख.. साली शक्ल देखी है क्या शीशे में!"

बीचबचाव करते हुए कंडक्टर गुर्राया,"चल अब उतर भी़ जा क्यों अपना जुलूस निकाल रही है।"

तमतमाया हुआ चेहरा लिए औरत नीचे उतर गई।

बस फिर चल पड़ी। फौजी तमक तमक कर औरत को कोसने लगा,"ऐसी बेहया औरतें तमाशा करती फिरती है।"

हर कोई अपने विचार देने लगा। 

ड्राइवर ने मूछों को ताव दिया और सामने के शीशे में से मुझे घूरता हुआ बोला,"अरे ऐसी सजी धजी चलती हैं। अगर किसी ने आँख मार भी़ दी तो क्या हुआ, चुपचाप उतर जाती। अपनी इज्जत अपने हाथ।

कंडक्टर समेत सब हामी भर रहे थे।  

और मैं अपना स्त्री सशक्तीकरण का पेपर गोद में दबाए चुपचाप आंखे बन्द कर सोने का उपक्रम करने लगी।


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