सुबह के दस बजने को आए और अभी कमला नहीं आई। मेरा पारा चढने ही लगा था कि कमला घर में घुसी और सीधे बर्तन घिसने लगी।
"आज इतनी देर...", अभी बात मेरे मुंह में ही थी कि कमला ने भरी भरी आंखों से मुझे देखा और झुरने लगी,
"क्या बताऊँ बीबीजी, आज तो दिन ही बुरा चढ़ा है। रात भर बकरी घर नहीं लौटी। सुबह पांच बजे पहाड़ी के पीछे जंगल में ढूंढने गई तो बुरी तरह जख्मी मिली। कमबख्त जंगली कुत्तों ने बुरी तरह खाया है। अभी इतनी हल्दी पट्टी करके आई हूं। आज जल्दी जाऊंगी । डंगर डॉक्टर को बुलाया है।"
कमला रेल की पटरियों के पार शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी पर बसे छोटे से गांव में रहती है। सुबह निकल आती है और दिन भर घरों मे काम कर शाम को गांव वापस लौटती है। मैने उसे जल्दी घर जाने दिया।
अगले दिन सुबह कमला आई और गुनगुनाते हुए काम पर लग गई।
"तो बच गई तुम्हारी बकरी?" मैंने पूछा।
"कहां बीबीजी, वह तो मेरे घर पहुंचने तक पार हो चुकी थी। भला हो कसाई का, आधी खाई बकरी के 1500 रुपए दे गया।"
कमला के मुंह पर विजयी मुस्कान थी।
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