उस के हाथ में फोन था पर डायल करने में उसके हाथ कांप रहे थे। भरी हुई आंखों के आगे सब कुछ चलचित्र सा घूम रहा था..।
पांच साल हुए बस एक्सीडेंट में पति चल बसे थे। तीन साल की बच्ची और बूढ़े ससुर, घर में तीन ही जी रह गए थे। प्राइमरी स्कूल के साथ लगती गली की नुक्कड़ पे छोटा सा तीन मंजिला मकान था। सबसे नीचे कापियों किताबों की दुकान, उसके ऊपर बाथरूम व दो छोटे कमरे जहां ससुर दिन भर अपने काढ़े कुश्ते बनाते खाते पड़े रहते और ऊपर उसका कमरा और रसोई। बस इन्हीं में उतरते चढते जीवन बीत रहा था।
पहले साल मायके में माँ ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर डाला था। परंतु वह खुद को पति की यादों से अलग नहीं कर पाई थी। अकेले रिटायर ससुर को कौन देखेगा का तर्क भी़ था।। फिर अगले वर्ष मां भी चल बसी थी। भाई बहन अपने अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। समय निकलता गया।
पिछले छह माह से उसकी कॉलेज की पुरानी सहेली बार बार फोन करके उसे समझाने की कोशिश कर रही थी़। उसका देवर अपनी पत्नी को एक हादसे मे खो बैठा था। दो साल का बेटा बिना मां का हो गया था। मगर वह मन नहीं बना पाई थी। स्वर्गीय पति के प्रति समर्पण व पारिवारिक जिम्मेदारी की भावना आड़े आ जाती।
बरस भर से भाभी ने चौदह पन्द्रह बरस का भांजा भेज दिया था। वह दुकान पर मदद कर देता। साथ में प्राइवेट मैट्रिक की पढ़ाई कर रहा था। बेटी अब तीसरी कक्षा में आ गई थी़। तीनों रात को कुछ देर टीवी देखते फिर वहीं सो जाते।
आज जब रात के खाने के बाद सोने से पहले ससुर को दूध का गिलास दे कर आने लगी तो उन्होंने रोक लिया। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे और आंखों में अजीब सी चमक। वह झपट कर वापस जाने लगी तो पीछे से वो फुसफुसाए," मर्द के घर में होते हुए छोकरे के साथ...।"आगे और कुछ सुनने से पहले वह लपक कर सीढ़ियां चढ़ आई।
कांपते हाथ से उसने नंबर घुमाया। सहेली की हैलो सुनते ही सिसक कर बोली, "मैं तैयार हूं।"

Sad reality of women in some parts of our society. :(
ReplyDeleteThanks for your observation
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