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Monday, December 21, 2020

SIBLINGS ARE NOT OPTIONAL

                            SIBLINGS ARE NOT OPTIONAL



 I have four siblings. Two brothers and two sisters. Old school!  Well maybe. But surely better than having no sibling at all!


Siblings  are your first best friends, your partners in crime. In fact having siblings is the most enduring relationship you have. As family is the first cradle of socialisation, having siblings makes it into a real family. You develop the feelings of altruism, learn sharing and  bonding and develop social and interpersonal skills. With siblings we develop informal behavioral traits like communication and negotiation skills, as says sociologists like Dr. Laurie Kramer.


The millennial parents do not even think about it. In fact the thought of even starting a family does not occur to them for many years after marriage. Its considered tacky to even discuss it.  And ofcourse having one child marks simultaneously the beginning and the end of  a family.


 The largest growing demographic today is  the one child family. The "only child syndrome" a concept created by G Stanley Hall in the 19th century is in vogue again. Even though he claimed that the"only children" were “spoilt, selfish and bossy”.  The same may be said of the "Little Emperors" born in China after the one-child policy was introduced in 1979.  They're a generation which have been labelled as selfish, spoilt, and maladjusted because they  have had no siblings to rival or share with. Even the psychologists  do not approve of it.  They believe that an only child could grow into an“oversensitive" person prone to “priggish self-conceit”.( Eugene W Bohannon)


Still the notion of only child has caught on. More so among the couples who are more career oriented, ambitious and driven. And of-course young. At this juncture of their life, with long hours of work, deadlines to meet, win the race for promotion, get a new house, invest in future et al, the option to start a family or have a second child takes a back seat. For some mothers who go in for their first child at mid thirties  after fulfilling their other goals, having a second one after a few years get fraught with other medical complications. And they do not want to risk it. It also feels prohibitive to once again get into the rut of sleepless nights, juggling hours and nanny hunting that a fresh child rearing entails. Then there's the financial angle as well. Modern parents are highly competitive and ambitious for their progeny too. Their child has to get the best education, get a foreign degree, best gadgets, the best of everything so bringing up one child is enough.


 So the poor child is deprived of having a sibling!


My first born was a baby girl, a child with special needs who needed special attention. So we did not go for a second child for many years lest she should be neglected. We doted on her, gave in to all her demands pampering her no end and ultimately spoiling her. She couldn't take no for an answer.  She was ten by the time we decided to give her a sibling that too after being rebuked by the doctors. So she got a sister eventually. Inspite of healthy sibling rivalry between the two, she learnt to accept her and love her. She started learning new things as the baby grew, sharing things and even being protective to the little one. The younger one too loved her sister unashamedly and we were proud parents revelling in their little achievements finding a purpose in life to nurture our little family. 


When my younger daughter was three I asked her once whether she would like another sibling. She vehemently declined and we did not give it another thought. We lost our special child when the younger one was twenty. And since that day she rues that she has no sibling to share her sorrows, joys or miletones in life. Worst was when she lost her father as well suddenly last year. She said to me, "mommy how could you heed the advice of a three year old while making such an important decision!  Now I won't have anybody to share my childhood memories once you are gone too." She expressed that feeling, even though she had had only a "special" sister as a sibling. 


The truth is that when we are young, living a busy life, pursuing many goals , living in just the 'moment', we don't think that far ahead. Our life choices are mostly archaic and expedient. By choosing to have only one kid, we are carving a lonely life for our kid, depriving him or her of the fun, laughter, sharing, squabbles, competitive rivalries, all the values that a family is about. We don't realize that we are choosing to shape up a future for our kid where he or she would be depriving their kids of an aunt or an uncle. Where there would be no extended family for their kids, no cousins, no family holidays, no real childhood. At this juncture, to young parents, old age looks so distant and their child's old age..well nobody gives it a thought at all. 


Nobody can predict where life takes us when we are at the dusk. When sometimes struck with tragedies, debilitated in mind and body we try to cope, they empathise with you giving you moral and emotional support. They are just there for you. Personally, being bereaved after losing my soulmate of thirty eight years in the blink of an eye, has made me realize how important it is to have siblings.


I thank my parents for giving me siblings.





Wednesday, October 7, 2020

शक

 


मैं बेसब्री से श्रुति की प्रतीक्षा कर रही थी। बचपन की सखियां दस वर्ष बाद मिल रहीं थी। केवल दो दिन के लिए बंगलोर आना हुआ था। कांफ्रेंस के बाद होटल के कमरे मेें ही खाना ऑर्डर कर रखा था। खूब बातें करेंगी दोनों।
श्रुति और मैं स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ थीं। अंतरंग सहेलियां, एक दूजे की राजदार, पार्टनर इन क्राइम। फिर उसकी शादी तय हो गई और मैं साइकोलॉजी में  पोस्ट ग्रेजुएशन करने हॉस्टल चली गई। फिर पीएचडी, नौकरी.. समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। वह शादी के बाद पति के साथ पहले विदेश चली गई फिर सिलिकॉन वैली, बंगलोर । मैं उत्तर भारत के दूसरे कोने मेें।। बस मिलना नहीं हो पाया।
मैंने उसे फोन पर मेरे पास ही रात रुकने को बोला था। वह मान नहीं रही थी फिर उसके पति को शादी के दिन छुपाए जूते ढूंढने मेें जो मदद की थी, याद दिलाई तो वह राज़ी हो गया। पांच साल की बेटी पति के पास ही छोड़ कर आ रही थी।
इतने में श्रुति ने दरवाज़ा नॉक किया और हम दोनों एक दूसरे के गले लग गईं। उसके पति बाहर से ही लौट गए रुके नहीं।  हम दोनों एक दूसरे को निहार रहीं थीं। वही गोरा  रंग, सुगठित देहयष्टि, हिरणी सी आंखें। लंबे बालों की जगह ब्लंट कट ने ले ली थी। श्रुति के रूपसौंदर्य के कारण ही तो राहुल उस पर मर मिटा था। एक शादी के फंक्शन में उसे देखा और अगले दिन ही अपने माता पिता को भेज दिया था।
परन्तु  श्रुति कीआंखों मेें वह चमक ना दिखी। हम खाना खा कर पुरानी यादें ताज़ा कर रहीं थीं। श्रुति का मोबाइल बजा। राहुल था। उससे बात करने के बाद उसका चेहरा फीका पड़ गया। मेरे पूछने पर पहले तो टाल गई पर कुछ देर बाद पुराने स्नेहिल नाते ने उसके मन के कपाट खोल दिए
"क्या बताऊं नीता, यह रूप रंग ही मेरा दुश्मन बन गया है। शादी के अगले दिन ही जब हम मायके फेरा डालने आए थे। घर जा कर राहुल ने इतनी तानाकशी की। तुम अपने कजिन्स से इतनी बेतकल्लुफ हो। फिर हनीमून पर भी यह मत पहनो वो मत पहनो। विदेश मेें रहते हुए मुझे कोई कोर्स कोई नौकरी नहीं करने दी। किसी पराए आदमी से बात भी कर लूं यह उनको गवारा नहीं। आज पता नहीं कैसे मान गया। अभी भी फोन पर कह रहा था, वही सहेली के साथ ही हो  या कोई और प्रोग्राम हैै," श्रुति के आंसू थम नहीं रहे थे।
मैं सन्न थी।  इतना पढ़ा लिखा आदमी और ऐसे टुच्चे विचार। शादी के इतने वर्ष बाद भी पत्नी के निष्कलंक हृदय को नहीं जान पाया। श्रुति अपना दिल हल्का करती रही। कैसे ऑफिस से भी फोन कर कर के टोह लेता रहता है। कभी अकेले शॉपिंग, सिनेमा तक भी जाने का सवाल नहीं। ऐसा तब जबकि पिछले दस साल मेें श्रुति ने कभी शक करने का कोई अवसर नहीं दिया।
   अगले दिन सुबह श्रुति वापस चली गईकांफ्रेंस लंच के बाद मैंने भी वापिसी की फ्लाइट पकड़ ली। सारे रास्ते मेरे भीतर का मनोवैज्ञानिक राहुल के शक्कीपन के कारण का विश्लेषण करता रहा। पर असफल हो गया।
वापस लौट कर भी श्रुति की व्यथा मेरे मानसपटल पर छाई रही।
एक माह बाद अपने शहर जाना हुआ। मां की गोद मेें सिर रख कर बचपन जी रही थी कि बरबस श्रुति का जिक्र निकल आया। और राहुल का भी। अपने ही शहर का जो ठहरा।उसकी घटिया सोच और शक्की स्वभाव के बारे मेें मां को बताया। मां कुछ चुप हो गई। किसी की भी गॉसिप करनी उसके स्वभाव में नहीं है ।
   फिर कुछ रुक कर धीरे से बोली,"बचपन में इस लड़के ने घर में पता नहीं क्या कुछ देखा हैै। बिजनेस में आगे बढ़ने के लिए पिता का घर मेें अफसरों, दूसरी फर्मों के मालिकों को लाना, पीना पिलाना। उस आदमी ने अपनी पत्नी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया। और पैसों, ऐशोआराम, महंगे उपहारों के लिए उनकी बीवी ने भी पूरा साथ दिया। ऐसे माता पिता और ऐसे गन्दे माहौल में पला बढ़ा लड़का ना जाने कितनी ग्रन्थियां पाल बैठा हैै।"

ओह श्रुति ! मेरा मन चीत्कार कर रहा था। इतनी कुंठाओं और कॉम्प्लेक्स से भरे पति के मन में शक का यह ज़हर तो नासूर बन चुका है। शायद अब इसी के साथ जीना तुम्हारी नियति है।

Tuesday, October 6, 2020

बदलाव

 


हॉल से लगातार अमित व अदिति की चुहलबाज़ी की आवाज़ें आ रहीं थीं। साथ ही उसकी सास के ठहाके। अमित आज ऑफिस से जल्दी घर आ गए थे। मीनल रसोई में उन सब के लिए चाय बना रही थी। उसकी सास भीतर आकर साथ पकोड़े और सैंडविच का भी हुक्म दे गईं थी।
उसकी सास ही घर की कर्ता धर्ता थीं। प्रखर व्यक्तित्व, दबंग। पूरे परिवार पर उनका ही सिक्का चलता था। सोसायटी की किट्टी पार्टियों की रौनक थीं। ससुर शहर के नामी गिरामी वकीलों में गिने जाते थे। अमित भी पिता की लॉ फर्म मेें ही उनके सहायक के तौर पर कार्यरत था।
सात साल पहले वह मीनल को अपने मायके के कस्बे से ब्याह कर लाई थी। इक्कीस बरस की छुई मुई सी मीनल आठ वर्ष बड़े अमित के सामने बच्ची सी लगती थी। पिता बचपन मेें चल बसे थे। चार  भाई बहनों में सब से बड़ी थी। ईश्वर ने वह कमी अतीव सौन्दर्य देकर पूरी कर दी थी। किसी शादी के लिए मायके आई उसकी सास को उसके सादे लावण्य ने मोह लिया था।

परन्तु अब वह किसी को एक आंख नहीं भा रही थी। सात साल से उसकी गोद जो सूनी थी। नौबत धागे टोटकों मंत्र तंत्र तक आ गई थी।  घर मेें पंडितों,  स्वामियों व पूजा पाठ का सिलसिला चल निकला था। उसकी सास उसे लेकर कई  बार हस्पतालों के चक्कर लगा चुकी थी। आखिर अमित उनका इकलौता बेटा था।
सास ससुर के तेवर बदले हुए थे। अमित तो शुरू से ही "मामाज़ ब्वॉय" था। उसका खाना पीना, कपड़े सब उसकी सास ही तय करतीं।
एक महीने से उसकी सास की सहेली की बेटी अदिति उनके यहां रह रही थी। किसी नौकरी के सिलसिले मेें शहर आई थी और उसकी सास ने फ्लैट मिलने तक घर पर ही रोक लिया था। अमित भी उससे काफी घुल मिल गया था। उसकी सास इससे काफी प्रसन्न दिखती थीं।
मीनल का दिल सुबह से धड़क रहा था। उसके बार बार कहने पर कल अमित उसके साथ अपना टेस्ट करवा कर आया था। बहुत कठिनता से उसकी सास इसके लिए राज़ी हुई थी। मीनल के सारे टेस्ट ठीक होने के कारण डाक्टर का कहना मानना ही पड़ा था।
      इतने में फोन की घंटी बजी। हमेशा की तरह उसकी सास ने फोन उठाया। जब मीनल चाय और नाश्ता लेकर हॉल मेें आई तो वे वहां नहीं थीं। रात को डिनर टेबल पर भी नहीं आईं। मीनल ने उनके बेडरूम का दरवाजा खटखटा कर खाने को पूछा तो मना कर उसे लौटा दिया।
अगले दिन नहा धो, पूजा कर मीनल हॉल में आई तो देखा अदिति अटैची लिए तैयार खड़ी थी।
"वह कई दिनों से अपनी दोस्त के साथ शिफ्ट होना चाह रही थी। मैं ही रोक रही थी," उसके जाने के बाद सास ने सफाई सी दी।

मीनल किचन की ओर जाने लगी तो उसका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया और बोलीं,"बेटी मैं सोच रही थी क्यों ना तुम और अमित बच्चा गोद ले लो। मेरी बहुत जान पहचान हैै मै बात करुंगी । छोटा और दूधमुआ बच्चा घर में आ जाएगा तो घर मेें रौनक हो जाएगी।"
मीनल उनके बदले हाव भाव देख रही थी।

Monday, September 28, 2020

दूसरी औरत


पहली बार उसे देखा था जब समीर मुझे देखने मेरे घर आए थे। गोरा रंग, गहरा मेकअप, नाभि के नीचे बांधी साड़ी और फैशनेबल काले चश्मे में चहकती, वह समीर की बड़ी भाभी से ज़्यादा बोल रही थी। समीर से लगभग पांच वर्ष बड़ी होगी। पता चला उनकी कंपनी में काम करती है दिल्ली में। उन्हीं के शहर आगरा की है , वीक एंड पर आई हुईं थीं सो चाव चाव में साथ हो ली थीं।
      शादी के बाद जब दिल्ली आ गई तो वह घर पर कभी नहीं आई। एक दो बार मैंने समीर से पूछा भी तो कहने लगे उसके पति, बेटा व सास आगरा में ही रहते हैं सो वीक एंड पर घर चली जाती हैं।
         इक्कीस वर्ष की  भोली भाली मैं समीर के संग नए जीवन के ताने बाने बुनने में मस्त थी। एक  बार समीर की ऑफिस पार्टी में ज़िद करके उनके साथ चली गई तो देखा वो सेक्सी तंग मैक्सी में पार्टी में छाई हुई थी। बार बार समीर को डांस फ्लोर पर घसीट रही थी। मैं साड़ी में सकुचाई सी एक ओर खड़ी थी कि समीर की एक दो सहयोगी लड़कियां मुझ से बतियाने लगीं। उनकी नजरें भी उन दोनों पर ही थीं। 
"आजकल समीर और मीरा कांफ्रेंसों में भाग लेनें नहीं जा रहे हर जगह, शुक्र है हमें भी अवसर मिल रहा है," एक ने कुटिल मुस्कान से कहा। तो दूसरी ने उसे कुहनी मारी और दोनों वहां से खिसक लीं थीं।
मेरा पत्नी का रडार एकदम खड़ा हो गया था। अब समझ आने लगा था कि क्यों समीर रात नौं बजे से पहले "ऑफिस से" घर नहीं आते। फोन पर पास वर्ड रहता है और रात को घंटी बजते ही वे "ओवरसीज ऑफिस से कॉल है" कह के दूसरे कमरे में चले जाते हैं।
घर लौट कर मैंने कुछ नहीं कहा। सोचती रही । मुझ में क्या कमी है। सुन्दर हूं। पढ़ी लिखी हूं। उम्र भी मेरे साथ है। क्या मैं अपने पति का दिल नहीं जीत सकती। 
पहले अपनी वॉर्डरोब बदल दी। समीर के उठने से पहले ही स्मार्ट ट्रैक सूट में जॉगिंग करके लौटती और बढ़िया ब्रेकफास्ट तैयार रखती। उससे शाम को जल्दी आने का आग्रह करती। और हर बार कोई ना कोई सरप्राइज तैयार रखती..अपने कपड़ों का , खाने पीने का। और शाम को रोमांटिक माहौल..। समीर धीरे धीरे  प्यार में डूबते चले गए.....।
काकपिट से हवाई जहाज के पायलट की घोषणा हो रही थी। जहाज थोड़ी देर में सिडनी लैंड करने वाला था। मंडे को समीर कम्पनी के सिडनी ऑफिस को ज्वाइन कर रहे थे। मैंने हल्के से उनके कंधे पर सिर रख दिया।
हमारा नया जीवन हमारी प्रतीक्षा कर रहा था।

Sunday, September 27, 2020

उम्रकैद


कॉलेज कैंटीन के सामने वाले लान में बैठी मैं चाय के सिप ले रही थी कि सुरजीत कौर आती दिखाई दी।

 "अरे आओ आओ। मिठाई का डिब्बा कहाँ है?" मैने उसका स्वागत करते हुए कैंटीन वाले को चाय लाने को कहा।

सुरजीत आके धम्म से बैठ गई। चेहरे पर खिन्नता और उदासी झलक रही थी। वह आज ही सप्ताह के बाद लौटी  है। छुट्टी लेकर गांव गई थी अपनी भतीजी की शादी पर। विवाह के दस साल के बाद भी अपनी कोई  संतान नही। भतीजी उसे बेटी से बढ़ कर प्रिय थी। दो साल पहले उसी के पास रह कर उसने इसी कॉलेज से बीकॉम की थी। फिर उसे आगे पढ़ने के लिए शहर भी उसी ने भेजा । बड़े भाई गांव में खेती करते हैं। सुरजीत के बाद वह पहली लड़की है जो इतना पढ़ लिख गई है।

  "काहे की मिठाई ," सुरजीत ने सिर झुका लिया।

"अरे क्या हुआ? क्या शादी टूट गई?"मैंने घबरा कर पूछा। सुरजीत कुलीग होने के साथ अंतरंग मित्र भी है। जाने से पहले भी काफी अनमनी सी थी पर मैं कुछ पूछ नहीं पाई थी।

"क्या कहूं! सिमरन यहां आने से पहले से ही गांव में स्कूल के एक लड़के के संपर्क में आ गई थी। यहां तीन साल में भी व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर उससे जुड़ी रही। वह उससे मिलने हमारी जानकारी के बिना यहां भी आता रहा। जब वह CA करने  शहर गई तो वहां भी पहुंच जाता था। खुद तो बाहरवी के बाद पढ़ा नहीं। बाप की जमीनों पर ऐश करता है। बुरी आदते हैं। सिमरन ने जब उससे पीछा छुड़ाना चाहा तो  सारे वीडियो, तस्वीरें लेकर  भाई साहिब के पास पहुंच गया...।

"लड़की और परिवार की इज्जत के लिए उसी निकम्मे आवारा से शादी करके आएं है। सिमरन रोती पछताती विदा हो गई। यह शादी थोड़ी थी ..यह उम्रकैद है उम्रकैद।" सुरजीत के आंसू बह रहे थे।


Saturday, September 26, 2020

गुलाबो

               गुलाबो


शाम होने को आई और सुनीता वैसे ही सोफे पर अधलेटी पड़ी थी। घर भी बिखरा पड़ा था। दोपहर को भी ना कुछ पकाया ना खाया। सुमित सुबह टूर पर चला गया। कल लौटेगा। 

प्रेम विवाह किया था उसने। सुमित के सिविल सर्विस में चुने जाने पर लोकल कॉलेज की नौकरी भी छोड़ दी थी । यहां वहां ट्रांसफर जो होती रहती थी। चपरासी से कोई घर का काम नहीं करवाती थी। सुमित के लिए उसकी पसंद का खाना बनाना उसे भाता था। स्वयं को पति घर गृहस्थी के लिए समर्पित कर दिया था।

रात व्हिस्की कुछ ज़्यादा हो गई थी। उसके टोकने पर सुमित गालियां बकने लगा। इतने पढ़े लिखे सरकारी अफसर के मुंह से इतना गंद। बिना खाए लेट गया। फिर उसका मन ना होने पर भी... ज़बरदस्ती...। अब अक्सर ऐसा होने लगा है। कुछ दिन पहले तो उसने उस पर हाथ भी उठा दिया था।

उसे अपने आप से घृणा होने लगी। एक अजीब सी वितृष्णा.. असहायता।

अगले दिन सुबह सुनीता नहा धो कर किचन में नाश्ता बना रही थी । घंटी बजी ।दरवाज़ा खोला तो देखा निर्मला है। उसके यहां बर्तन, सफाई करती है। दो दिन से आई नहीं थी। बेचारी बहुत ही बदकिस्मत है। चार बच्चे हैं, तीन लड़कियां और एक सबसे छोटा लड़का। पति नशाखोर है। जो कमाता है सब नशे के निमित्त कर देता है। एक पैसा कभी घर खर्चे के लिए नहीं दिया। जब मांगती है तो वही लातखोरी, गाली गलौज। झोपड़ पट्टी में रहते हुए चार चार घरों में काम करके जैसे तैसे घर चला रही है बेचारी।
"क्या बात हुई निर्मला तुम दो दिन से आई नहीं?"
निर्मला ने साड़ी का पल्लू सरका कर दिखाया। उसकी गर्दन पर नीले निशान थे। आंख के पास भी नील ।
"दीदी परसों मूएं ने बहुत मारा। पता नहीं सर पर क्या सवार था। बिना बात के मेरा गला पकड़ लिया। ज़ोर ज़ोर से मुझ पर गन्दे इल्ज़ाम लगाने लगा। तीन तीन बेटियों की मां हूं। इतनी बेइज्जती। रात भर सिसकती रही...। 
कल सुबह सीधी पुलिस चौकी गई। वहां साहब ने कहा तू मार क्यों खाती है। तुझ में जान नहीं है। दिखा दे उसको घर में मर्द कौन है। हम तेरे साथ हैं। बस घर आकर मैंने कपड़े धोने का डंडा उठा लिया।  दो डंडे नशेड़ी की पीठ पर धरे और उसे साफ कह दिया कि रहना तो इन्सानों की तरह रह वरना निकाल बाहर करुंगी।  तब से भीगी बिल्ली बना बैठा है।" निर्मला गर्व से बोली और पल्लू कमर में ठूंस बर्तन साफ करने लगी।
सुनीता जड़वत खडी़ रह गई। उसे लगा सामने निरीह निर्मला नहीं, गुलाबी गैंग की गुलाबो खड़ी है।

Friday, September 18, 2020

उनसे पूछो...

 

कुछ माह की नकाब ने हमें गाफिल कर दिया
उनसे पूछो जो सदियों से बुर्कों में बन्द हैं

कुछ माह की तालाबंदी से हम बेज़ार हो लिए
उनसे पूछो जिनके हलफ दूसरों के पाबंद हैं

कुछ माह से दोस्तों की महफिलें नाबाद हैं
उनसे पूछो जो तन्हाइयों की कैद मेंआबाद हैं

कुछ माह से महफिलें ज़ूम तक नज़रबंद हैं

उनसे पूछो जिनके चूल्हे रोजी बिन मंद हो गये

कुछ माह की तमाम बन्दिशों से परेशां हो गए
उनसे पूछो जिनके अपने चिर निंद्रा में सो गए।

Thursday, September 17, 2020

अंकल



                                                           अंकल                                    



 दरवाज़े की घंटी बजी। आंटी नहा कर निकली ही थीं सो मैं लपक कर गई। पीप होल से देखा एक सूटेड बूटेड अंकल खड़े हैं। आँखों पे काला चश्मा, उंगली पर कार की चाभी घुमा रहे हैं। मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो मुझे देख कर सकपका गए। तभी आंटी ब्लाउज पेटीकोट में ही लिविंग रूम में आ गईं। 

"आओ बैठो। यह मेरी कजिन की बेटी हैं।कोई एंट्रेंस एग्जाम देने आई है", वही खड़े खड़े हाथ में पकड़ी साड़ी लपेटते हुए उन्होंने परिचय करवाया।

अंकल ज़्यादा देर बैठे नहीं। चाय पी और उठ खड़े हुए। दरवाज़ा बन्द करते हुए मैंने देखा बाहर कार  थी नही। थोड़ा आगे जा कर देखा कार तीन कोठियां छोड़ कर खडी़ थी। 

"हमारे बहुत पुराने पारिवारिक फ्रेंड्स हैं।  तुम एग्जाम दे लो। उनके यहां ले चलूंगी। बहुत बड़ा सरकारी बंगला मिला हुआ है",   आंटी ने बताया।

आंटी के पति भी बड़े अफसर थे। बहुत साल पहले कार एक्सीडेंट में चल बसे। एक बेटा है विदेश में नौकरी कर रहा है। गोरी चिट्टी, कटे बाल, फर्राटे दार इंग्लिश बोलतीं है। पूरे शहर में कार चला लेती हैं। पैसे की कोई कमी नहीं। मुझ जैसी छोटे से शहर में रहने वाली बाहरवी पास लड़की को तो वे आईडल ही लगती हैं।

मेरा पेपर हो गया। आगे वीक एंड था। दस बजे आंटी कहने लगीं,"चलो उनके घर चलते हैं उस साइड मुझे कुछ काम भी है।"

रास्ते में बोलीं," वहां ज़्यादा बातें मत करना।" कम्पाऊण्ड में कार खडी़ कर अन्दर घुसे। उनका अर्दली लॉबी में ले गया अंकल एक सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनकी पत्नी ने स्वागत किया और ड्राइंग रूम में ले चली। 

अंकल ने हमें देख कर भी अनदेखा सा कर दिया। मेरी नमस्ते के उत्तर में हल्का सा सिर हिलाया और वापिस अखबार पढ़ने लग गए। आंटी को तो उन्होंने बुलाया तक नहीं। मुझे बहुत बुरा सा लगा।

 उनकी पत्नी ने चपरासी को चाय लाने को कहा। बार बार पति की बहुत बिज़ी लाइफ और जिम्मेदारियों की ही बातें सुनाती रही। एकाध घंटे बाद हम वापस आने लगे तो अंकल लॉबी में नहीं थे।

  मैं वापिसी में अजीब सा महसूस कर रही थी। पर आंटी की आंखो में अजीब सी चमक थी। कहने लगीं,"देखा कितनी मुरझाई सी लगने लगी है इन्दु। मुझसे छोटी होगी पर कितनी अधेड़ सी लग रही थी।"



Sunday, September 13, 2020

प्रश्न


 

प्रश्न

मैं कॉलेज में  सबसे ऊपर की मंजिल के लंबे कॉरिडोर में अण्ने विभाग की ओर जा रही थी तो देखा एक प्रोफेसर ज़ोर ज़ोर से किसी लड़की को डांट रही है। लड़की छुई मुई सी खडी़ थी। गोरा रंग, पोनी टेल, सिम्पल सा सूट और भोला सा चेहरा।
"क्या हुआ," मैंने पूछा।
मैडम क्रोध से चिल्लाई, "यह ख़ाली लेक्चर हाॅल के बाहर पहरा दे रही थी और अंदर एक लड़का लड़की चिपटा चिपटी कर रहे थे। वो कमबख्त तो भाग गए। अब यह उनकी क्लास और नाम बता नहीं रही।"
उन दिनों कॉलेज का चार्ज मेरे पास था। दोनो को मैंने ऑफिस में बुला लिया। लड़की अभी बीए प्रथम वर्ष में ही आई थी। सीमा नाम था। बार बार दोहरा रही थी कि वह उनको नहीं जानती। थोड़ा समझा बुझा कर मैंने उसे जाने दिया। तो मैडम कहने लगी,"मैडम आप नहीं जानती यह दिखती भोली है...।" खैर बात आई गई हो गई।
फर्स्ट ईयर की वेलकम पार्टी में उसे फिर से देखा। स्टेज पर हाथ में डायरी लिए स्वरचित कविताएं सुनाते हुए। बाद में मैंने उसे अपने पास बुलाया था। "बेटा तुम तो बहुत अच्छा लिखती हो पर सब इतना उदास क्यों। खुशी के गीत गाया करो। यू आर सो यंग।"
फिर एक दिन स्टाफ रूम में आई तो वोही मैडम हाथ नचा कर कुछ बोल रही थी। मुझे देखते ही कहने लगीं,"अरे मैडम उसी सीमा के किस्से सुना रही हूं। अाप को बड़ी भोली लगती थी ना। आजकल लड़के लड़कियां उसे चने के झाड़ पे चढ़ा कर खूब यूज कर रहे हैं। कभी किसी ग्रुप के साथ बैठी होती है कभी किसी। क्लास में आती नहीं। मै तो इसके लेक्चर शॉर्ट कर दूंगी।"
साल बीत चला था। फेयरवेल पार्टी वाले दिन देखा सीनियर्स उसे स्टेज पर  बार बार चढा कर उसका मज़ाक बना रहे थे। वैसे भी इस दिन विद्यार्थियों को कंट्रोल करना काफ़ी कठिन हो जाता है।
      ग्रीष्मावकाश के बाद आज कॉलेज खुला है। नयी एडमिशन की तैयारी चल रही है। स्टाफ रूम में आई तो देखा कि सबके चेहरों पर उदासी थी।
"वह सीमा लड़की थी ना फर्स्ट ईयर में! उसने परसों  सुसाइड कर लिया।  परसों ही रिजल्ट निकला था। फेल हो गई थी। पता चला है कि मां पागल है और बाप एक दर्जे का शराबी। कोई भार्इ बहन भी नही। बस गेहूं में डालने वाली गोलियां खा लीं।"एक प्रोफेसर ने बताया।
मै सन्न थी। बेचारी लड़की । मुझे समझ जाना चाहिए था। अंतरंगता की तलाश में भटकती रही। उसकी मनोदशा, उसकी मानसिकता को कोई समझ नहीं पाया। किसी ने कोशिश ही नहीं की। ना उसके सहपाठियों ने ना हम अध्यापकों ने। क्या अध्यापन केवल किताबों तक ही सीमित है? क्या उसे बुला कर काउंसलिंग नहीं करनी चाहिए थी?


यह प्रश्न मुझे जीवन भर झकझोरते रहेंगे।

Friday, September 11, 2020

बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

 

लोग बहरे हैैं इन्हें दिल की सुनाया न करो
बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

तेज़ हवा के झोंके से मिट जायेगी
रेत पे मेरी तस्वीर बनाया ना करो

उठ आए जो इस पार कभी लौटते नहीं
तन्हा बैठ के हमें बुलाया ना करो

यादों की धूल झाड़ कर उजाला करलो
उदासी के अंधेरों में खो जाया ना करो

गत जीवन की खुशियां पिरो लो मन में
नम आंखों से झूठा मुस्कराया ना करो

मिलेंगे उस पार वादा है मेरा तुमसे
फूंक फूंक के दिल को यूं जलाया ना करो

लोग बहरे हैैं इन्हें दिल की सुनाया न करो
बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

दूसरी शादी

 

       


उस के हाथ में फोन था पर डायल करने में उसके हाथ कांप रहे थे। भरी हुई आंखों के आगे सब कुछ चलचित्र सा घूम रहा था..।


           पांच साल हुए बस एक्सीडेंट में पति चल बसे थे।  तीन साल की बच्ची और बूढ़े ससुर, घर में तीन ही जी रह गए थे। प्राइमरी स्कूल के साथ लगती गली की नुक्कड़ पे छोटा सा तीन मंजिला मकान था। सबसे नीचे कापियों किताबों की दुकान, उसके ऊपर बाथरूम व दो छोटे कमरे जहां ससुर दिन भर अपने काढ़े कुश्ते बनाते खाते पड़े रहते और ऊपर उसका कमरा और रसोई। बस इन्हीं में उतरते चढते जीवन बीत रहा था। 


पहले साल मायके में माँ ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर डाला था। परंतु वह खुद को पति की यादों से अलग नहीं कर पाई थी। अकेले रिटायर ससुर को कौन देखेगा का तर्क भी़ था।। फिर अगले वर्ष मां भी चल बसी थी। भाई बहन अपने अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। समय निकलता गया। 


पिछले छह माह से उसकी कॉलेज की पुरानी सहेली बार बार फोन करके उसे समझाने की कोशिश कर रही थी़। उसका देवर अपनी पत्नी को एक हादसे मे खो बैठा था। दो साल का बेटा बिना मां का हो गया था। मगर  वह मन नहीं बना पाई थी। स्वर्गीय पति के प्रति समर्पण व पारिवारिक जिम्मेदारी की भावना आड़े आ जाती।


बरस भर से भाभी ने चौदह पन्द्रह बरस का भांजा भेज दिया था। वह दुकान पर मदद कर देता। साथ में प्राइवेट मैट्रिक की पढ़ाई कर रहा था। बेटी अब तीसरी कक्षा में आ गई थी़। तीनों रात को कुछ देर टीवी देखते फिर वहीं सो जाते। 


आज जब रात के खाने के बाद सोने से पहले ससुर को दूध का गिलास दे कर आने लगी तो उन्होंने रोक लिया। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे और आंखों में अजीब सी चमक। वह झपट कर वापस जाने लगी तो पीछे से वो फुसफुसाए," मर्द के घर में होते हुए  छोकरे के साथ...।"आगे  और कुछ सुनने से पहले वह लपक कर सीढ़ियां चढ़ आई।


कांपते हाथ से उसने नंबर घुमाया। सहेली की हैलो सुनते ही  सिसक कर बोली, "मैं तैयार हूं।"

Wednesday, September 9, 2020

दुआ


उनके जाने के बाद...


जो सांसे उनकी सोहबत में चलती थीं
तन्हाई के शोर में गुमसुम सी हैं

जो बातें उनकी गुफ्तगू में सुनते थे
खामोशी में एहसास का गुंजन भर हैं

उनकी नजदीकियां जो कभी आसपास थीं
अब ख्वाबों की ताबीर में ढूंढते हैं

उनकी जुदाई ने इबादत सिखा दी
वरना हम तो संग की खुशी में काफ़िर बने बैठे थे

जिस खुदा ने मेरी किस्मत से बेदखल कर दिया उनको
हर जनम में वो साथ हों उससे यह इज़हार करते हैं

अगले जहां में मिलने की दुआ है अब
ज़िन्दगी को उसके कबूल होने का इंतजार कहते है।





Tuesday, September 8, 2020

माथा पच्ची

 


     घर में उत्सव सा माहौल था। पाँच साल बाद बेटा बहू अमरीका से आ रहे थे। वो भी़ अकेले नहीं, दो दो नातियों के साथ। चार साल का पोता और डेढ़ वर्ष की नन्हीं पोती। अमरीक सिंह और पत्नी दर्शन कौर के साथ साथ बूढ़े दादा दादी भी फूले नहीं समा रहे थे।

       गांव का सबसे होनहार लड़का था उनका अजीत। बाहरवी में 97 प्रतिशत नंबर लेकर इंजीनियरिंग कॉलेज चला गया था। फिर एमएनसी मे प्लेसमेंट पाकर तीन साल में ही अमरीका। वहीं उसकी कम्पनी में ही काम कर रही सुनीता से शादी पक्की कर ली थी़। उस का परिवार जो पास के शहर का ही था भी़ खुशी से राज़ी हो गया था। बस दोनो पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर आए थे। हफ्ते बाद शादी और तीन चार दिन बाद ही बेटा बहू शहर मिलने मिलाने चले गए, वहीं से दिल्ली एयरपोर्ट और वापस अमरीका। यूं ही पांच साल निकल गए थे।
   "अरे मेरा परपोता आ रहा है। हम दोनो को तो सोने की पौड़ी (सीढ़ी) पड़ेगी। मै तो अपने हाथों से चूरी खिलाऊंगी उसे,"अजीत की दादी ना जाने कितनी बार दोहरा चुकी थी। दर्शन कौर मुस्करा कर बोली,"मैंने तो उसके लिए पड़ोस की बेबी की मदद से कुकर में केक बनाया है। देखें क्या खाता है चूरी या केक।"
     शाम को टैक्सी आकर रूकी। दरवाजे पर तेल चू कर बच्चाें को अन्दर लाया गया। गांव की औरतों ने शादी जैसा माहौल बना डाला। दोनो बच्चे मम्मी पापा की गोद में थे। उन्हें देख कर दर्शन कौर और दादी के आँसू नहीं सूख रहे थे। थोड़ी देर बाद उन्होंने पोते को गोद में लेना चाहा तो वह सहम कर अपने पापा के कंधे से लग गया। नन्हीं पोती सोई हुईं थी़।
       रात को अजीत के बहुत कहने पर पोता दर्शन कौर की गोद में आ गया। वह उससे तोतली भाषा में बतियाने लगी। पर बच्चा बिलकुल कुछ समझ नहीं पा रहा था। वो कभी उसके मुंह की ओर देखता कभी अपने माँ बाप की ओर। कुछ ना समझ पाने के कारण वो उसकी गोद में तिलमिलाने लगा और उठ कर अपनी मम्मी के पास चला गया।
"आप लोगों ने बच्चे को अपनी भाषा बिलकुल नहीं सिखाई," दर्शन कौर हतप्रभ थी। "हम तो इससे बात ही नहीं कर पा रहे। हमारी तो तमन्ना दिल में ही रह गई अपने पोते से मीठी मीठी बातें करने की। उसकी प्यारी बातें सुनने की।"
"मैंने कई बार कहा भी़....," अजीत ने सुनीता की ओर देखा और चुप हो गया।
"अब दस पन्द्रह दिन के लिए कौन माथा पच्ची करता। वहां तो हम यहां की बोली बोलते नहीं", सुनीता ने तुनक कर जवाब दिया और बेटे का हाथ पकड़ कर अन्दर सोने चली गई।
बूढ़े दादा दादी और दर्शन कौर  निस्तब्ध थे।    


     

Monday, September 7, 2020

REMINISCENCES OF A SEXAGENARIAN


Reminiscences of  a Sexagenarian 






Reminiscing or going down the memory lane is therapeutic if you want to remember good and happy memories.They can bring a smile to your lips or  guffaws if you are sharing with a sibling or old friends. On the other hand sad memories bring tears and heartache. I wouldn’t go there!


I don’t remember much about sixties. I guess the life was black and white like the movies. About movies I remember seeing many from the front benches where our peon would seat the four of us, leaving the youngest who was a toddler at home, thankfully. And being the eldest I remember he would pay one rupee for four “passes” which the cinema owner would oblige us with, being the kids of Tehsildar sahib.


Ah those seventies! Who wouldn’t remember the bell bottoms, elephant pants and parallels. As the name would suggest the elephant pants were even wider than the loose parallels. For a while lungis also came in fashion, so our mother sacrificed a couple of old sarees to get those made for me and my sister, also a visiting aunt and a cousin and we would proudly flaunt those uniforms around! I remember wearing tunics with double breasted Jacket and trousers to a movie “Kal Aaj Aur Kal” and feeling delighted at seeing the hero wearing the same combination..the HERO not the heroine! How innocent we were!


Seeing my interest in photography my parents had gifted me an Agfa Click camera worth fifty rupees. It was my prized possession for many years. I still have black and white pictures of my sister combing my grandma’s hair or another one with my brother sitting as a king, one sister fanning him from the back, the other brother standing and blessing like a Rajguru and the youngest sister draped  in a dupatta saree sitting on the floor with folded hands, directed and clicked by me.


            The mornings would invariably start with film songs on Urdu Service on radio, our only source of entertainment for a while. Then we got HMV record player with LP records, our prized possession for a long time. After a couple of failed attempts to watch tv at friends’, our father agreed to buy us a black and white TV on the condition that we would not go to the plains for our winter vacation. So now we could see those weekly Chitrahaars and movies at home. One benefit of living in a hill station was that along with Amritsar Doordarshan we could catch Lahore TV loud and clear. So we got hooked to Pakistani dramas like Uncle Urfi, Dhoop Chaon et al.


TV was black and white but it was fun to watch cricket test matches as the players wore white. We would dread the death of any political leader as for days the tv and radio would only broadcast mourning classical music that would kill us. 


         Those days the concept of holidays was limited to visiting grandparents or relatives who lived in plains where it did not snow in winters. likewise they would visit us in summers when the weather used to be pleasant in our town. We would take them around for picnics to picturesque places around in Papa’s official jeep. 


For us teenagers, the greatest fun was our daily walks where our friends would join us on the way. We would be a giggling judgemental flock of girls on the winding roads making fun of the tourists and breaking into chaste English when anybody passed us.


I remember once my sister and I made fun of a gentleman for his unusual style of walking, repeatedly mumbling  “twisting man” while passing him on the road. A couple of days later we were aghast to see him on our door. He was an officer in the PWD and had come to meet father on some business. We were scared to death that he would complain to Papa about us but thankfully he never did or probably had not heard us.


        Those days we thought we rocked as we could sing along ABBA and Carpenters and shake a leg or two on Boney Ms. It was the in thing to be abreast of the latest “pop” music. We used to have jam sessions at home crooning to Nazia Hassan’s Disco Diwane. “Bobby” had been a craze and almost all  girls had the posters of the lead couple in their rooms. My parents were kind enough to allow Star and Style along with The Illustrated Weekly, Readers Digest and Dharamyug to our home subscriptions. So I was fully familiar with how Kaka (Rajesh Khanna) proposed to Dimple or how Dharam Garam was chasing Hema Malini.


          My parents were also musical. both could sing beautifully something which I have not inherited unlike other siblings. I have fond memories of some evenings when power would be off and all of us would sit in the glazed varandah under candle lights and our parents would sing old songs and duets.


          My father especially had high expectations as far as my studies were concerned, me being his eldest I guess. And I tried to never let him down. He was a law graduate with Honours in  English and his command over the language was astounding. None of us come anywhere near him. He would often make me write a précis of an editorial from the Tribune. Listening to English news was always a part of the day. He would dictate to me my speeches extemporaneously whenever I would be participating in declamations or debates which was often.

             

 

 


              *To be continued.....


Saturday, September 5, 2020

मुस्कान

 

                                                      

सुबह के दस बजने को आए और अभी कमला नहीं आई। मेरा पारा चढने ही लगा था कि कमला घर में घुसी और सीधे बर्तन घिसने लगी।


"आज इतनी देर...", अभी बात मेरे मुंह में ही थी कि कमला ने भरी भरी आंखों से मुझे देखा और झुरने लगी,

"क्या बताऊँ बीबीजी, आज तो दिन ही बुरा चढ़ा है। रात भर बकरी घर नहीं लौटी। सुबह पांच बजे पहाड़ी के पीछे जंगल में ढूंढने गई तो बुरी तरह जख्मी मिली। कमबख्त जंगली कुत्तों ने बुरी तरह खाया है। अभी इतनी हल्दी पट्टी करके आई हूं। आज जल्दी जाऊंगी । डंगर डॉक्टर को बुलाया है।"

कमला रेल की पटरियों के पार  शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी पर बसे छोटे से गांव में रहती है। सुबह निकल आती है  और दिन भर घरों मे काम कर  शाम को गांव वापस लौटती है। मैने उसे जल्दी घर जाने दिया।

अगले दिन सुबह कमला आई और गुनगुनाते हुए काम पर लग गई। 

"तो बच गई तुम्हारी बकरी?" मैंने पूछा।

"कहां बीबीजी, वह तो मेरे घर पहुंचने तक पार हो चुकी थी। भला हो कसाई का, आधी खाई बकरी के 1500 रुपए दे गया।" 

कमला के मुंह पर विजयी मुस्कान थी।  

वैश्या

 


तेज़ बारिश के साथ साथ बिजली कड़क रही थी। अंधेरी सड़क पर टैक्सी चल रही थी। पिछली सीट पर वह पड़ोस के माताजी के साथ डरी सी बैठी थी। सुबह वे दोनो घर से शहर के लिए निकली थीं। शहर में जहां उसकी ससुराल थी। ससुर फिर बीमार हो गए थे। पति को कोई जरूरी काम आन पड़ा था उन्होंने पैसे देकर भेजा था कि ससुर को अस्पताल में भर्ती करवा कर और सास और छोटे देवर को हौंसला देकर लौट आना। यूं तो रात रुक कर आने को कहा था पर घर में दो साल का बेटा और पांच साल की बेटी के कारण उसने रात को लौटना ही ठीक समझा। पड़ोस के माता जी तो साथ थीं ही जिन्हें वह साथ के लिए विनती कर अपने साथ ले आई थी।  मगर रास्ते में टायर पंचर हो जाने के कारण वे और लेट हो गए थे। उस पर तेज वर्षा के कारण टैक्सी धीरे धीरे चल रही थी।  रास्ते में कहीं रुक कर कोई पीसीओ ढूंढ कर पति को बताने का अवसर भी नहीं मिल पाया था।                                 

 रात के बारह बज रहे थे । रवि बेड पर औंधा लेटा वीसीआर पर ब्ल्यू फिल्म देख रहा था। बीच बीच में ग्लास से व्हिस्की सिप कर लेता। क्वार्टर खाली होने को था। दूसरे कमरे में पालने में छोटा बेटा गहरी नींद में था। उसने  खांसी की दवा का आधा चम्मच उसे और एक चम्मच बेटी को पिला दिया था। दोनों बेसुध सो रहे थे। नीचे कालीन पर  चौदह पन्द्रह बरस की काम वाली लड़की भी बेपरवाह सो रही। थी। उसे आज उसने बच्चे को संभालने का बहाना कर के लिए रोक लिया था। रवि के मुंह पर अजीब सी मुकराहट थी।


      इतने में बाहर घंटी बजी। इतनी रात को कौन...। उसने जल्दी से वीसीआर बन्द किया। बोतल को बेड के नीचे खिसकाया। दरवाजा खोला तो बीवी सकपकाई सी खडी़ थी। 


"इतनी लेट.. इस टाइम पर तुम सड़कों पर घूम रहीं थीं। क्या ज़रूरत थी रात को ही वापस चलने की। सुबह आ जाती। रास्ते में अगर पुलिस या कोई रोकता तो क्या सोचता कि कोई वैश्या अपनी पिंप बाई के साथ कहीं जा रही है...", रवि का क्रोध और बौखलाहट चरम सीमा पर थे।  






स्त्री सशक्तीकरण

   स्त्री सशक्तीकरण




बस ठसाठस भरी हुई थी़। जितने लोग बैठे थे उतने खड़े भी थे। गर्मी और उमस से माथा भुनभुना रहा था। मै ड्राइवर की पिछली सीट पर खिड़की से लगी बैठी थी। यूनिवर्सिटी में स्त्री सशक्तीकरण पर सेमिनार अटैंड करके लौट रही थी। ट्रेन मिस हो जाने के कारण लोकल बस लेनी पड़ी थी।

 बस हर दस मिनट के बाद रुक जाती प्राइवेट होने के कारण कंडक्टर हर स्टॉप पर सवारी उठा रहा था। इतने मे फिर किसी स्टॉप पर बस रुकी और कंडक्टर चिल्लाने लगा,"जल्दी उतरो भई और लोगो को भी चढ़ने दो" 

अचानक उतरने को उन्मुखखड़ी हो सवारी कर रही एक औरत ने सामने की सीट पर बैठे मोटे तगड़े फौजी से लगने वाले व्यक्ति को एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया। साथ ही चिल्लाई,"इसने मुझे आंख मारी है। मुर्दुआ आधे घण्टे से घूर रहा था।"

औरत पैंतीस के आसपास की रही होगी। हट्टी कट्टी पंजाबन, गहरे रंग का फूलों का कढ़ाई दार सूट, लाल लिपस्टिक और काला चश्मा। रास्ते मे किसी गांव से चढी थी। सारी बस में सन्नाटा सा छा गया। 

उसे थप्पड़ दिखाते हुए फौजी ने गन्दी गाली बकी और चीखा, "तुझे और आंख.. साली शक्ल देखी है क्या शीशे में!"

बीचबचाव करते हुए कंडक्टर गुर्राया,"चल अब उतर भी़ जा क्यों अपना जुलूस निकाल रही है।"

तमतमाया हुआ चेहरा लिए औरत नीचे उतर गई।

बस फिर चल पड़ी। फौजी तमक तमक कर औरत को कोसने लगा,"ऐसी बेहया औरतें तमाशा करती फिरती है।"

हर कोई अपने विचार देने लगा। 

ड्राइवर ने मूछों को ताव दिया और सामने के शीशे में से मुझे घूरता हुआ बोला,"अरे ऐसी सजी धजी चलती हैं। अगर किसी ने आँख मार भी़ दी तो क्या हुआ, चुपचाप उतर जाती। अपनी इज्जत अपने हाथ।

कंडक्टर समेत सब हामी भर रहे थे।  

और मैं अपना स्त्री सशक्तीकरण का पेपर गोद में दबाए चुपचाप आंखे बन्द कर सोने का उपक्रम करने लगी।