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Saturday, September 26, 2020

गुलाबो

               गुलाबो


शाम होने को आई और सुनीता वैसे ही सोफे पर अधलेटी पड़ी थी। घर भी बिखरा पड़ा था। दोपहर को भी ना कुछ पकाया ना खाया। सुमित सुबह टूर पर चला गया। कल लौटेगा। 

प्रेम विवाह किया था उसने। सुमित के सिविल सर्विस में चुने जाने पर लोकल कॉलेज की नौकरी भी छोड़ दी थी । यहां वहां ट्रांसफर जो होती रहती थी। चपरासी से कोई घर का काम नहीं करवाती थी। सुमित के लिए उसकी पसंद का खाना बनाना उसे भाता था। स्वयं को पति घर गृहस्थी के लिए समर्पित कर दिया था।

रात व्हिस्की कुछ ज़्यादा हो गई थी। उसके टोकने पर सुमित गालियां बकने लगा। इतने पढ़े लिखे सरकारी अफसर के मुंह से इतना गंद। बिना खाए लेट गया। फिर उसका मन ना होने पर भी... ज़बरदस्ती...। अब अक्सर ऐसा होने लगा है। कुछ दिन पहले तो उसने उस पर हाथ भी उठा दिया था।

उसे अपने आप से घृणा होने लगी। एक अजीब सी वितृष्णा.. असहायता।

अगले दिन सुबह सुनीता नहा धो कर किचन में नाश्ता बना रही थी । घंटी बजी ।दरवाज़ा खोला तो देखा निर्मला है। उसके यहां बर्तन, सफाई करती है। दो दिन से आई नहीं थी। बेचारी बहुत ही बदकिस्मत है। चार बच्चे हैं, तीन लड़कियां और एक सबसे छोटा लड़का। पति नशाखोर है। जो कमाता है सब नशे के निमित्त कर देता है। एक पैसा कभी घर खर्चे के लिए नहीं दिया। जब मांगती है तो वही लातखोरी, गाली गलौज। झोपड़ पट्टी में रहते हुए चार चार घरों में काम करके जैसे तैसे घर चला रही है बेचारी।
"क्या बात हुई निर्मला तुम दो दिन से आई नहीं?"
निर्मला ने साड़ी का पल्लू सरका कर दिखाया। उसकी गर्दन पर नीले निशान थे। आंख के पास भी नील ।
"दीदी परसों मूएं ने बहुत मारा। पता नहीं सर पर क्या सवार था। बिना बात के मेरा गला पकड़ लिया। ज़ोर ज़ोर से मुझ पर गन्दे इल्ज़ाम लगाने लगा। तीन तीन बेटियों की मां हूं। इतनी बेइज्जती। रात भर सिसकती रही...। 
कल सुबह सीधी पुलिस चौकी गई। वहां साहब ने कहा तू मार क्यों खाती है। तुझ में जान नहीं है। दिखा दे उसको घर में मर्द कौन है। हम तेरे साथ हैं। बस घर आकर मैंने कपड़े धोने का डंडा उठा लिया।  दो डंडे नशेड़ी की पीठ पर धरे और उसे साफ कह दिया कि रहना तो इन्सानों की तरह रह वरना निकाल बाहर करुंगी।  तब से भीगी बिल्ली बना बैठा है।" निर्मला गर्व से बोली और पल्लू कमर में ठूंस बर्तन साफ करने लगी।
सुनीता जड़वत खडी़ रह गई। उसे लगा सामने निरीह निर्मला नहीं, गुलाबी गैंग की गुलाबो खड़ी है।

Friday, September 18, 2020

उनसे पूछो...

 

कुछ माह की नकाब ने हमें गाफिल कर दिया
उनसे पूछो जो सदियों से बुर्कों में बन्द हैं

कुछ माह की तालाबंदी से हम बेज़ार हो लिए
उनसे पूछो जिनके हलफ दूसरों के पाबंद हैं

कुछ माह से दोस्तों की महफिलें नाबाद हैं
उनसे पूछो जो तन्हाइयों की कैद मेंआबाद हैं

कुछ माह से महफिलें ज़ूम तक नज़रबंद हैं

उनसे पूछो जिनके चूल्हे रोजी बिन मंद हो गये

कुछ माह की तमाम बन्दिशों से परेशां हो गए
उनसे पूछो जिनके अपने चिर निंद्रा में सो गए।

Thursday, September 17, 2020

अंकल



                                                           अंकल                                    



 दरवाज़े की घंटी बजी। आंटी नहा कर निकली ही थीं सो मैं लपक कर गई। पीप होल से देखा एक सूटेड बूटेड अंकल खड़े हैं। आँखों पे काला चश्मा, उंगली पर कार की चाभी घुमा रहे हैं। मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो मुझे देख कर सकपका गए। तभी आंटी ब्लाउज पेटीकोट में ही लिविंग रूम में आ गईं। 

"आओ बैठो। यह मेरी कजिन की बेटी हैं।कोई एंट्रेंस एग्जाम देने आई है", वही खड़े खड़े हाथ में पकड़ी साड़ी लपेटते हुए उन्होंने परिचय करवाया।

अंकल ज़्यादा देर बैठे नहीं। चाय पी और उठ खड़े हुए। दरवाज़ा बन्द करते हुए मैंने देखा बाहर कार  थी नही। थोड़ा आगे जा कर देखा कार तीन कोठियां छोड़ कर खडी़ थी। 

"हमारे बहुत पुराने पारिवारिक फ्रेंड्स हैं।  तुम एग्जाम दे लो। उनके यहां ले चलूंगी। बहुत बड़ा सरकारी बंगला मिला हुआ है",   आंटी ने बताया।

आंटी के पति भी बड़े अफसर थे। बहुत साल पहले कार एक्सीडेंट में चल बसे। एक बेटा है विदेश में नौकरी कर रहा है। गोरी चिट्टी, कटे बाल, फर्राटे दार इंग्लिश बोलतीं है। पूरे शहर में कार चला लेती हैं। पैसे की कोई कमी नहीं। मुझ जैसी छोटे से शहर में रहने वाली बाहरवी पास लड़की को तो वे आईडल ही लगती हैं।

मेरा पेपर हो गया। आगे वीक एंड था। दस बजे आंटी कहने लगीं,"चलो उनके घर चलते हैं उस साइड मुझे कुछ काम भी है।"

रास्ते में बोलीं," वहां ज़्यादा बातें मत करना।" कम्पाऊण्ड में कार खडी़ कर अन्दर घुसे। उनका अर्दली लॉबी में ले गया अंकल एक सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनकी पत्नी ने स्वागत किया और ड्राइंग रूम में ले चली। 

अंकल ने हमें देख कर भी अनदेखा सा कर दिया। मेरी नमस्ते के उत्तर में हल्का सा सिर हिलाया और वापिस अखबार पढ़ने लग गए। आंटी को तो उन्होंने बुलाया तक नहीं। मुझे बहुत बुरा सा लगा।

 उनकी पत्नी ने चपरासी को चाय लाने को कहा। बार बार पति की बहुत बिज़ी लाइफ और जिम्मेदारियों की ही बातें सुनाती रही। एकाध घंटे बाद हम वापस आने लगे तो अंकल लॉबी में नहीं थे।

  मैं वापिसी में अजीब सा महसूस कर रही थी। पर आंटी की आंखो में अजीब सी चमक थी। कहने लगीं,"देखा कितनी मुरझाई सी लगने लगी है इन्दु। मुझसे छोटी होगी पर कितनी अधेड़ सी लग रही थी।"



Sunday, September 13, 2020

प्रश्न


 

प्रश्न

मैं कॉलेज में  सबसे ऊपर की मंजिल के लंबे कॉरिडोर में अण्ने विभाग की ओर जा रही थी तो देखा एक प्रोफेसर ज़ोर ज़ोर से किसी लड़की को डांट रही है। लड़की छुई मुई सी खडी़ थी। गोरा रंग, पोनी टेल, सिम्पल सा सूट और भोला सा चेहरा।
"क्या हुआ," मैंने पूछा।
मैडम क्रोध से चिल्लाई, "यह ख़ाली लेक्चर हाॅल के बाहर पहरा दे रही थी और अंदर एक लड़का लड़की चिपटा चिपटी कर रहे थे। वो कमबख्त तो भाग गए। अब यह उनकी क्लास और नाम बता नहीं रही।"
उन दिनों कॉलेज का चार्ज मेरे पास था। दोनो को मैंने ऑफिस में बुला लिया। लड़की अभी बीए प्रथम वर्ष में ही आई थी। सीमा नाम था। बार बार दोहरा रही थी कि वह उनको नहीं जानती। थोड़ा समझा बुझा कर मैंने उसे जाने दिया। तो मैडम कहने लगी,"मैडम आप नहीं जानती यह दिखती भोली है...।" खैर बात आई गई हो गई।
फर्स्ट ईयर की वेलकम पार्टी में उसे फिर से देखा। स्टेज पर हाथ में डायरी लिए स्वरचित कविताएं सुनाते हुए। बाद में मैंने उसे अपने पास बुलाया था। "बेटा तुम तो बहुत अच्छा लिखती हो पर सब इतना उदास क्यों। खुशी के गीत गाया करो। यू आर सो यंग।"
फिर एक दिन स्टाफ रूम में आई तो वोही मैडम हाथ नचा कर कुछ बोल रही थी। मुझे देखते ही कहने लगीं,"अरे मैडम उसी सीमा के किस्से सुना रही हूं। अाप को बड़ी भोली लगती थी ना। आजकल लड़के लड़कियां उसे चने के झाड़ पे चढ़ा कर खूब यूज कर रहे हैं। कभी किसी ग्रुप के साथ बैठी होती है कभी किसी। क्लास में आती नहीं। मै तो इसके लेक्चर शॉर्ट कर दूंगी।"
साल बीत चला था। फेयरवेल पार्टी वाले दिन देखा सीनियर्स उसे स्टेज पर  बार बार चढा कर उसका मज़ाक बना रहे थे। वैसे भी इस दिन विद्यार्थियों को कंट्रोल करना काफ़ी कठिन हो जाता है।
      ग्रीष्मावकाश के बाद आज कॉलेज खुला है। नयी एडमिशन की तैयारी चल रही है। स्टाफ रूम में आई तो देखा कि सबके चेहरों पर उदासी थी।
"वह सीमा लड़की थी ना फर्स्ट ईयर में! उसने परसों  सुसाइड कर लिया।  परसों ही रिजल्ट निकला था। फेल हो गई थी। पता चला है कि मां पागल है और बाप एक दर्जे का शराबी। कोई भार्इ बहन भी नही। बस गेहूं में डालने वाली गोलियां खा लीं।"एक प्रोफेसर ने बताया।
मै सन्न थी। बेचारी लड़की । मुझे समझ जाना चाहिए था। अंतरंगता की तलाश में भटकती रही। उसकी मनोदशा, उसकी मानसिकता को कोई समझ नहीं पाया। किसी ने कोशिश ही नहीं की। ना उसके सहपाठियों ने ना हम अध्यापकों ने। क्या अध्यापन केवल किताबों तक ही सीमित है? क्या उसे बुला कर काउंसलिंग नहीं करनी चाहिए थी?


यह प्रश्न मुझे जीवन भर झकझोरते रहेंगे।

Friday, September 11, 2020

बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

 

लोग बहरे हैैं इन्हें दिल की सुनाया न करो
बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

तेज़ हवा के झोंके से मिट जायेगी
रेत पे मेरी तस्वीर बनाया ना करो

उठ आए जो इस पार कभी लौटते नहीं
तन्हा बैठ के हमें बुलाया ना करो

यादों की धूल झाड़ कर उजाला करलो
उदासी के अंधेरों में खो जाया ना करो

गत जीवन की खुशियां पिरो लो मन में
नम आंखों से झूठा मुस्कराया ना करो

मिलेंगे उस पार वादा है मेरा तुमसे
फूंक फूंक के दिल को यूं जलाया ना करो

लोग बहरे हैैं इन्हें दिल की सुनाया न करो
बंद दरवाजों पे दस्तक लगाया ना करो

दूसरी शादी

 

       


उस के हाथ में फोन था पर डायल करने में उसके हाथ कांप रहे थे। भरी हुई आंखों के आगे सब कुछ चलचित्र सा घूम रहा था..।


           पांच साल हुए बस एक्सीडेंट में पति चल बसे थे।  तीन साल की बच्ची और बूढ़े ससुर, घर में तीन ही जी रह गए थे। प्राइमरी स्कूल के साथ लगती गली की नुक्कड़ पे छोटा सा तीन मंजिला मकान था। सबसे नीचे कापियों किताबों की दुकान, उसके ऊपर बाथरूम व दो छोटे कमरे जहां ससुर दिन भर अपने काढ़े कुश्ते बनाते खाते पड़े रहते और ऊपर उसका कमरा और रसोई। बस इन्हीं में उतरते चढते जीवन बीत रहा था। 


पहले साल मायके में माँ ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर डाला था। परंतु वह खुद को पति की यादों से अलग नहीं कर पाई थी। अकेले रिटायर ससुर को कौन देखेगा का तर्क भी़ था।। फिर अगले वर्ष मां भी चल बसी थी। भाई बहन अपने अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। समय निकलता गया। 


पिछले छह माह से उसकी कॉलेज की पुरानी सहेली बार बार फोन करके उसे समझाने की कोशिश कर रही थी़। उसका देवर अपनी पत्नी को एक हादसे मे खो बैठा था। दो साल का बेटा बिना मां का हो गया था। मगर  वह मन नहीं बना पाई थी। स्वर्गीय पति के प्रति समर्पण व पारिवारिक जिम्मेदारी की भावना आड़े आ जाती।


बरस भर से भाभी ने चौदह पन्द्रह बरस का भांजा भेज दिया था। वह दुकान पर मदद कर देता। साथ में प्राइवेट मैट्रिक की पढ़ाई कर रहा था। बेटी अब तीसरी कक्षा में आ गई थी़। तीनों रात को कुछ देर टीवी देखते फिर वहीं सो जाते। 


आज जब रात के खाने के बाद सोने से पहले ससुर को दूध का गिलास दे कर आने लगी तो उन्होंने रोक लिया। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे और आंखों में अजीब सी चमक। वह झपट कर वापस जाने लगी तो पीछे से वो फुसफुसाए," मर्द के घर में होते हुए  छोकरे के साथ...।"आगे  और कुछ सुनने से पहले वह लपक कर सीढ़ियां चढ़ आई।


कांपते हाथ से उसने नंबर घुमाया। सहेली की हैलो सुनते ही  सिसक कर बोली, "मैं तैयार हूं।"

Wednesday, September 9, 2020

दुआ


उनके जाने के बाद...


जो सांसे उनकी सोहबत में चलती थीं
तन्हाई के शोर में गुमसुम सी हैं

जो बातें उनकी गुफ्तगू में सुनते थे
खामोशी में एहसास का गुंजन भर हैं

उनकी नजदीकियां जो कभी आसपास थीं
अब ख्वाबों की ताबीर में ढूंढते हैं

उनकी जुदाई ने इबादत सिखा दी
वरना हम तो संग की खुशी में काफ़िर बने बैठे थे

जिस खुदा ने मेरी किस्मत से बेदखल कर दिया उनको
हर जनम में वो साथ हों उससे यह इज़हार करते हैं

अगले जहां में मिलने की दुआ है अब
ज़िन्दगी को उसके कबूल होने का इंतजार कहते है।