दूसरों की सोच व विचारों को बदलना बहुत कठिन है परंतु असंभव नहीं है।
स्वभाव से मनुष्य यही समझता है कि वह ठीक है और दूसरे गलत। कहीं पढ़ा था कि "यदि आप किसी को अपना शत्रु बनाना चाहते हैं तो उसे कहिए कि वह गलत है।" हर व्यक्ति ज्यों ज्यों बड़ा होता है उसके मूल्य, जीवन दर्शन व विचार निश्चित हो जाते हैं। उसकी सोच उसके पारिवारिक समाजीकरण, सामाजिक परिपेक्ष्य अनुसार पनपती है। इसमें पारंपरिक मूल्यों का भी योगदान होता है। जैसे जैसे हम परिपक्व होते हैं हमारे विचार भी दृढ़ होते जाते हैं। परंतु आज के डिजिटल युग में टैक्नोलॉजी के बदलते आयामों के साथ हमारी जीवन शैली, हमारे दृष्टिकोण व सोच भी बदल रहे हैं।
हर नई पीढ़ी को लगता है कि वे अपने बड़े बूढ़ों की सोच को नहीं बदल सकते। विशेषकर पुराने रीति रिवाजों को बदलना उनके लिए बहुत कठिन होता है। दूसरे की सोच को बदलना है भी बहुत कठिन।
फिर भी यदि आप किसी के विचारों से असहमत हैं तो उसका उपहास उड़ाए बिना तर्क तथा उदाहरण के साथ अपनी बात रखें, शुभ चिंतन करें और खुले मन से उनकी बात भी सुनें। तर्क शीलता व तथ्यों पर आधारित विचार विमर्श से दूसरे के विचारों को प्रभावित किया जा सकता है। इसके लिए वस्तुनिष्ठ खुला मन व प्रभावशाली प्रतिपादन की कला चाहिए। यदि आपके तर्क ठोस तथ्यों से भरपूर है और दूसरे को पता है कि आप उसके शुभ चिंतक हैं तो वह किसी विषय के बारे मे अपनी सोच बदल सकता है