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Monday, January 30, 2023

सनम तेरे बिना

 दालान भर अंधेरे हैं सनम तेरे बिना

हर रात कटती जीवन की सवेरे बिना


दोस्तों की महफिल मैं खोए खोए से हैं

शब्द भी सन्नाटो ने घेरे हैं  सनम तेरे बिना


अंधेरे रास आ गए हैं हमें इस कदर

उदासी की चादर में छिपे बैठे है उजारे तेरे बिना


मायूस सा कर गया हार जीत का खेल

अब तो हार भी मान जाते हैं  सनम हारे बिना


सांस लेने का हुनर  ज़िंदगी ने सिखा दिया

यूं तो गुजरता हर पल सनम  गुजारे बिना


ना मंजिल की खबर ना  राह है कोई

 बस भटकते फिरते हैं खुद को संवारे बिना


कोशिश तो बहुत  है  स्मित के दिए जला लें

खुशियों के फूल खिल ना सके पर सनम तेरे बिना


दालान भर अंधेरे हैं सनम तेरे बिना

हर रात कटती जीवन की सवेरे बिना




Wednesday, September 15, 2021

Heart to heart

 How does a woman on the wrong side of sixties supposed to live after her soulmate departs suddenly? How is she supposed to deal with living alone day after day in the house  she shared with her life companion of nearly forty years? What's expected of her? How does the society perceive her? 

 Shouldn't she be seen wrapped up in mourning ensemble, moping in a corner, waiting for the dooms day to join her beloved ? It seems some "well wishers" would like that very much as that would be the validation of her love and devotion to her beloved. How can she not shed tears and hide her devastated state of mind and not sink into a fathomless pit of loneliness and deprivation ? 

 Wouldn't doing the opposite make her being unfaithful to the dear departed ?

While ensconced in their happy,  normal family life they just sit there and judge. They don't see the effort to combat the day to day pain, the will power to rise above the constant strain of loss and grief and show a brave face to the world. So that the people dont get the vicarious pleasure of  doling out sympathy and advice,  subconsciously relishing her suffering.

For them, if she makes the herculean effort to live for her self and/or her progeny trying her best not to deprive them of another parent and or   showcases/shares the small delights she shares with them or with family, is bordering on blasphemy!

After all she's an indian middle class wi....w. 

(Can't even bring myself to use the word).

The only consolation is that such "well-wishers" form a miniscule minority!!

Tuesday, March 23, 2021

क्या हम दूसरों की सोच बदल सकते हैं

 

दूसरों की सोच व विचारों को बदलना बहुत कठिन है परंतु असंभव नहीं है।
स्वभाव से मनुष्य यही समझता है कि वह ठीक है और दूसरे गलत। कहीं पढ़ा था कि "यदि आप किसी को अपना शत्रु बनाना चाहते हैं तो उसे कहिए कि वह गलत है।" हर व्यक्ति ज्यों ज्यों बड़ा होता है उसके मूल्य, जीवन दर्शन व विचार निश्चित हो जाते हैं। उसकी सोच उसके पारिवारिक समाजीकरण, सामाजिक परिपेक्ष्य अनुसार पनपती है। इसमें पारंपरिक मूल्यों का भी योगदान होता है। जैसे जैसे हम परिपक्व होते हैं हमारे विचार भी दृढ़ होते जाते हैं। परंतु आज के डिजिटल युग में टैक्नोलॉजी के बदलते आयामों के साथ हमारी जीवन शैली, हमारे दृष्टिकोण व सोच भी बदल रहे हैं।
हर नई पीढ़ी को लगता है कि वे अपने बड़े बूढ़ों की सोच को नहीं बदल सकते। विशेषकर पुराने रीति रिवाजों को बदलना उनके लिए बहुत कठिन होता है। दूसरे की सोच को बदलना है भी बहुत कठिन।
फिर भी यदि आप किसी के विचारों से असहमत हैं तो उसका उपहास उड़ाए बिना तर्क तथा उदाहरण के साथ अपनी बात रखें, शुभ चिंतन करें और खुले मन से उनकी बात भी सुनें। तर्क शीलता व तथ्यों पर आधारित विचार विमर्श से दूसरे के विचारों को प्रभावित किया जा सकता है। इसके लिए वस्तुनिष्ठ  खुला मन व प्रभावशाली प्रतिपादन की कला चाहिए। यदि आपके तर्क ठोस तथ्यों से भरपूर है और दूसरे को पता है कि आप उसके शुभ चिंतक हैं तो वह किसी विषय के बारे मे अपनी सोच बदल सकता है

Friday, March 19, 2021

हमारी विरासत और हम

 

विरासत देश  और लोगों की पहचान को परिलाक्षित करती  है।
भारत एक ऐसा देश है जहाँ की विरासत अत्यंत विस्तृत, समृद्ध तथा विविध है। हमारी यह बहुमूल्य विरासत  केवल स्‍मारकों ,  कला वस्‍तुओं के संग्रहण तथा ऐतिहासिक स्थानों तक ही सीमित  है बल्कि इसमें हमारी परंपराएं , हमारी सोच व जीवनशैली भी शामिल  है जो सदियों से चलती आई है। हमारे पूर्वजों से प्राप्‍त
इस समृद्ध तथा अद्वितीय विरासत को बचाये रखना हमारा कर्तव्य भी है और अधिकार भी। हमारी परंपराएं, कला प्रदर्शन, धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक उत्‍सव और परंपरागत शिल्पकारी हमारे
गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं। हमारे पूर्वजों ने सदियों से हमारी विरासत को संरक्षित किया है,  हमें अपनी जड़ों से जोड़ कर रखा है। हमारा भी कर्तव्य है युवा पीढ़ी में अपनी विरासत के लिए प्रेम का आह्वान करें। शुरू से ही  युवा पीढ़ी को हमारे गौरवशाली अतीत से परिचित कराएं।  इससे उनके अंदर गर्व की भावना लाने में मदद मिलेगी और वे परंपरा को जारी रखने के लिए प्रेरित होंगे । इसके लिए शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों के सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
आज के विश्वीकरण एवं औद्योगिकीकरण के युग में हम बेशक पश्चिमी मूल्यों व जीवन शैली की ओर उन्मुख हो रहे हैं ।  टेक्नोलॉजी से हो रहे  तीव्र परिवर्तनों  के कारण आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज़ हो रही है। ऐसे में अपनी विरासत को सुरक्षित रख पाना वाकई किसी चुनौती से कम नहीं है।  इन सब की महत्ता से भी  इंकार नहीं किया जा सकता। आवश्यकता है दोनों में सामंजस्य बिठाने की। हमें चाहिए कि हम किसी देश से पीछे भी न रहें । साथ में अपनी समृद्ध विरासत से गौरवान्वित हो उसे अगली पीढ़ी को भी पारित करें। 

यही हर भारतीय के जीवन का उद्वेश्य होना चाहिए।


Tuesday, March 16, 2021

क्या जीवन लक्ष्य बिना व्यर्थ है

 

क्या जीवन लक्ष्य बिना व्यर्थ है

कहीं पढ़ा था कि लक्ष्य हीन जीवन बिना पते के लिफाफे की तरह होता है जो इधर उधर पड़ा रहता है। सचमुच लक्ष्य होना जीवन को दिशा प्रदान करता है, सार्थक बनाता है। बचपन से ही हम सपने देखने लगते हैं कि बड़े होकर क्या बनेंगे। आजकल तो बच्चे के स्कूल में भर्ती होते ही उसके माता पिता भी उसके भविष्य के सपने संजोना शुरू कर देते हैं। वास्तव मे लक्ष्यहीन जीवन अधूरा है।
लक्ष्य से हमारा अभिप्राय केवल जीवन का ध्येय अथवा लक्ष्य नहीं हैं अपितु लक्ष्य छोटे छोटे भी हो सकते हैं। जैसे स्वस्थ जीवन शैली अपनाना, दूसरों के प्रति सहिष्णुता, दयालुता तथा मैत्रीभाव विकसित करना, अच्छे श्रोता बन दूसरों की बात सुनना आदि। कुछ भी करने या बनने का ध्येय निश्चित ज़रूर करना चाहिए। आवश्यक यह है कि जो भी लक्ष्य हम निर्धारित करें उसे पूरा अवश्य करें। अर्जुन की आंख की तरह हमारा पूरा फोकस उसी लक्ष्य पर होना चहिए। लक्ष्य निश्चित करना तथा उस के लिए कार्यशील रहना हमें उत्साह, स्फूर्ति व प्रेरणा से भरपूर रखता है। हमारे जीवन को उद्देश्य तथा मार्गदर्शन प्रदान करता है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि जिनके जीवन में कोई लक्ष्य नहीं उनका जीवन व्यर्थ ही है।
किसी ने सही कहा है..
जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
इन आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

Monday, March 15, 2021

हर समय खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए

 

हर समय खुश रहने के लिए क्या करना चाहिए

खुशी एक मनोस्थिति है। एक सापेक्ष शब्द। प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुशी के अलग अलग पहलु या अर्थ हो सकते हैं परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि हर कोई खुश रहना चाहता है। और हर वक्त खुश रहने की भी इच्छा रखता है। और ऐसा संभव भी है,  यदि हम चाहें तो। इच्छाशक्ति हो तो इंसान क्या नहीं कर सकता।
हर वक्त खुश रहने के लिए हमें कुछ आदतें डालनी होंगी।
     एक अच्छी नींद लेकर उठें और उठते ही मुस्कराइए। जी हां। मुकराने से हमारा ब्रेन डोपामिन पैदा करता है जोकि खुशी का हार्मोन है। एक नई भोर दिखाने के लिए ईश्वर का धन्यवाद कीजिए। या किसी भी  चीज़ के बारे में अपने मन में कृतज्ञता महसूस कीजिए। आप को अनिवर्चनीय आनंद की अनुभूति होगी। प्राणायाम तथा योग भी हमें खुशी देते हैं। सारा दिन हम तरोताजा व प्रफुल्लित रहते हैं। अपने मन को नकारात्मकता से दूर रखें। नकारात्मक लोगों से भी। अच्छी पुस्तकें पढ़े, अच्छे प्रोग्राम देखें और अपनी पसंद की हॉबी को समय दें। अपने जीवन के लक्ष्य स्वयं चुनें और उन पर पूरे उत्साह से फोकस करें। जीवन है तो दुःख सुख भी होंगे। अपने दुखों या जीवन की त्रासदियों को स्वीकारें और आगे बढ जाएं। अतीत में नहीं बल्कि भविष्य की सुखद कामना में जीना सीखें।
किसी जरूरतमंद की सहायता कीजिए। किसी बच्चे के साथ बच्चा बन मुस्कराइये। अपने परिवार जनों संग सुख दुख बांटिए। कुछ अपनी कहिए कुछ उनकी सुनिए।
आप भी हरदम खुश रहेंगे और आपके आसपास वाले भी। :)

Friday, March 12, 2021

Thought for Today: क्या हृदय की पुकार ईश्वर तक पहुंचती है

 

क्या हृदय की पुकार ईश्वर तक  पहुंचती है

प्रश्न यह नही है, प्रश्न है क्या हम ईश्वर को दिल से पुकारते हैं। यदि हां तो अवश्य ईश्वर तक हमारी पुकार पहुंचती है।
प्रभु हमारी आस्था हमारी निष्ठा के भूखे हैं। वे हमारे अटूट विश्वास के प्रतीक हैं। वे तो अंतर्यामी हैं। हमारी आत्मा में निहित हैं। उन्हें पुकारने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता।
मेरी स्वर्गीय मां ने एक बार एक स्वामीजी से पूछा,"मैं जब भी ईश्वर की पूजा में बैठती हूं मेरे अश्रु निकलते हैं। ऐसा क्यों?" स्वामीजी ने कहा था,"तुम्हारे पांच बच्चे हैं। जब तुम काम मे व्यस्त होती हो, यदि बड़ा बच्चा पुकारता है तो तुम कहती हो आती हूं और अपना काम करती रहती हो। पर यदि छोटा शिशु ज़ोर से रोता है तो काम छोड़ कर भागती हो। ऐसा क्यों"?
जब हम एक अबोध बालक की भांति सच्चे मन से प्रभु को पुकारते हैं तो वे भी सब कुछ छोड़ कर हमारी पुकार सुनते हैं। वे तो भाव के भूखे हैं।

कहा कहौं छवि आप की, भले बने हो नाथ !
तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान लो हाथ !!

तुलसी दास जी की पुकार सुन कर कृष्ण भगवान ने भी बांसुरी छोड़ धनुष बाण उठा लिया था।

डा. नीलिमा डोगरा