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Friday, March 5, 2010

कुछ दिन से मन बहुत उदास है जैसे मन की परतो को काले बदलो ने ढ्क रखा है, समझ में नहीं आता आज की २१ सदी में भी क्या बेटिया उसी तरह अपमानित होती रहेंगी? क्या पढ़ लिख कर भी सदा उन्हें सेकंड रेट सिटिज़न बन कर ही रहना होगा? क्या उनकी हर गलती की सजा उन के चरित्र पर दोष लगा कर ही दी जाती रहेगी? क्या उन्हें सदा इस अंतिम हथ्यार से निरस्त्र किया जाता रहेगा? क्या बहुए कभी बेटिया नहीं बन सकती? हम बेटियों के सात खून भी माफ कर देते है मगर बहुयों की हर बात को तेज़ धर से काटते छांटते है? ऐसा क्यों?

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