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Wednesday, March 31, 2010

जीवन का सच...?

Parents can only give good advice or put them on the right paths, but the final forming of a person's character lies in their own hands...हमें सदा उनकी रिसपेक्ट करनी चाहिए चाहे वह parents हों या parents इन law..कोई भी माँ बाप अपने बच्चो का बुरा नहीं चाहते, शायद यह जताने का उनका तरीका हमें पसंद ना हो पर इस में कोई शक नहीं की परिवार की बुनियाद सदा माता पिता के मान-सम्मान , मर्यादा पालन पर ही टिकती है..हर बेटा-बेटी/बहु को यह सदा याद रखना चाहिए...सुखी , प्रेम भरे जीवन के लिए गिव एंड टेक ज़रूरी है और इसमें कोई शक नहीं कि स्त्री को ही सबसे बढ़ कर adjustment करनी पढ़ती है॥ इसी में उसकी बढ़ाई है...इसी में उसकी
महानता है .

Monday, March 29, 2010

यही हमारा Jeevna

बेटियां तो सब की सांझी होती है फिर बहु और बेटी में अंतर क्योँ? इतना पढ़ लिख कर भी, २१वि सदी में भी क्या अभी भी इनकी तकदीर नहीं बदलेगी? क्या अभी भी सीता की अग्नि -परीक्षा जारी रहेगी? अभी भी उसे दुत्कारा , तिरकृसित किया जाता रहेगा? सदा उसे शक की परिधि में बांध कर Judge किया जाता रहेगा? ज़रा सा भी react करने पर उस पर झूठी तोहमते लगा कर मानसिक पीढ़ा दी जाती रहेगी? समाज के ठेकेदार उसे क्या यूह़ी प्रतारित करते रहेंगे?

Friday, March 5, 2010

कुछ दिन से मन बहुत उदास है जैसे मन की परतो को काले बदलो ने ढ्क रखा है, समझ में नहीं आता आज की २१ सदी में भी क्या बेटिया उसी तरह अपमानित होती रहेंगी? क्या पढ़ लिख कर भी सदा उन्हें सेकंड रेट सिटिज़न बन कर ही रहना होगा? क्या उनकी हर गलती की सजा उन के चरित्र पर दोष लगा कर ही दी जाती रहेगी? क्या उन्हें सदा इस अंतिम हथ्यार से निरस्त्र किया जाता रहेगा? क्या बहुए कभी बेटिया नहीं बन सकती? हम बेटियों के सात खून भी माफ कर देते है मगर बहुयों की हर बात को तेज़ धर से काटते छांटते है? ऐसा क्यों?