मैं बेसब्री से श्रुति की प्रतीक्षा कर रही थी। बचपन की सखियां दस वर्ष बाद मिल रहीं थी। केवल दो दिन के लिए बंगलोर आना हुआ था। कांफ्रेंस के बाद होटल के कमरे मेें ही खाना ऑर्डर कर रखा था। खूब बातें करेंगी दोनों।
श्रुति और मैं स्कूल से लेकर कॉलेज तक साथ थीं। अंतरंग सहेलियां, एक दूजे की राजदार, पार्टनर इन क्राइम। फिर उसकी शादी तय हो गई और मैं साइकोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने हॉस्टल चली गई। फिर पीएचडी, नौकरी.. समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। वह शादी के बाद पति के साथ पहले विदेश चली गई फिर सिलिकॉन वैली, बंगलोर । मैं उत्तर भारत के दूसरे कोने मेें।। बस मिलना नहीं हो पाया।
मैंने उसे फोन पर मेरे पास ही रात रुकने को बोला था। वह मान नहीं रही थी फिर उसके पति को शादी के दिन छुपाए जूते ढूंढने मेें जो मदद की थी, याद दिलाई तो वह राज़ी हो गया। पांच साल की बेटी पति के पास ही छोड़ कर आ रही थी।
इतने में श्रुति ने दरवाज़ा नॉक किया और हम दोनों एक दूसरे के गले लग गईं। उसके पति बाहर से ही लौट गए रुके नहीं। हम दोनों एक दूसरे को निहार रहीं थीं। वही गोरा रंग, सुगठित देहयष्टि, हिरणी सी आंखें। लंबे बालों की जगह ब्लंट कट ने ले ली थी। श्रुति के रूप व सौंदर्य के कारण ही तो राहुल उस पर मर मिटा था। एक शादी के फंक्शन में उसे देखा और अगले दिन ही अपने माता पिता को भेज दिया था।
परन्तु श्रुति कीआंखों मेें वह चमक ना दिखी। हम खाना खा कर पुरानी यादें ताज़ा कर रहीं थीं। श्रुति का मोबाइल बजा। राहुल था। उससे बात करने के बाद उसका चेहरा फीका पड़ गया। मेरे पूछने पर पहले तो टाल गई पर कुछ देर बाद पुराने स्नेहिल नाते ने उसके मन के कपाट खोल दिए।
"क्या बताऊं नीता, यह रूप रंग ही मेरा दुश्मन बन गया है। शादी के अगले दिन ही जब हम मायके फेरा डालने आए थे। घर जा कर राहुल ने इतनी तानाकशी की। तुम अपने कजिन्स से इतनी बेतकल्लुफ हो। फिर हनीमून पर भी यह मत पहनो वो मत पहनो। विदेश मेें रहते हुए मुझे कोई कोर्स कोई नौकरी नहीं करने दी। किसी पराए आदमी से बात भी कर लूं यह उनको गवारा नहीं। आज पता नहीं कैसे मान गया। अभी भी फोन पर कह रहा था, वही सहेली के साथ ही हो या कोई और प्रोग्राम हैै," श्रुति के आंसू थम नहीं रहे थे।
मैं सन्न थी। इतना पढ़ा लिखा आदमी और ऐसे टुच्चे विचार। शादी के इतने वर्ष बाद भी पत्नी के निष्कलंक हृदय को नहीं जान पाया। श्रुति अपना दिल हल्का करती रही। कैसे ऑफिस से भी फोन कर कर के टोह लेता रहता है। कभी अकेले शॉपिंग, सिनेमा तक भी जाने का सवाल नहीं। ऐसा तब जबकि पिछले दस साल मेें श्रुति ने कभी शक करने का कोई अवसर नहीं दिया।
अगले दिन सुबह श्रुति वापस चली गई। कांफ्रेंस लंच के बाद मैंने भी वापिसी की फ्लाइट पकड़ ली। सारे रास्ते मेरे भीतर का मनोवैज्ञानिक राहुल के शक्कीपन के कारण का विश्लेषण करता रहा। पर असफल हो गया।
वापस लौट कर भी श्रुति की व्यथा मेरे मानसपटल पर छाई रही।
एक माह बाद अपने शहर जाना हुआ। मां की गोद मेें सिर रख कर बचपन जी रही थी कि बरबस श्रुति का जिक्र निकल आया। और राहुल का भी। अपने ही शहर का जो ठहरा।उसकी घटिया सोच और शक्की स्वभाव के बारे मेें मां को बताया। मां कुछ चुप हो गई। किसी की भी गॉसिप करनी उसके स्वभाव में नहीं है ।
फिर कुछ रुक कर धीरे से बोली,"बचपन में इस लड़के ने घर में पता नहीं क्या कुछ देखा हैै। बिजनेस में आगे बढ़ने के लिए पिता का घर मेें अफसरों, दूसरी फर्मों के मालिकों को लाना, पीना पिलाना। उस आदमी ने अपनी पत्नी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया। और पैसों, ऐशोआराम, महंगे उपहारों के लिए उनकी बीवी ने भी पूरा साथ दिया। ऐसे माता पिता और ऐसे गन्दे माहौल में पला बढ़ा लड़का ना जाने कितनी ग्रन्थियां पाल बैठा हैै।"
ओह श्रुति ! मेरा मन चीत्कार कर रहा था। इतनी कुंठाओं और कॉम्प्लेक्स से भरे पति के मन में शक का यह ज़हर तो नासूर बन चुका है। शायद अब इसी के साथ जीना तुम्हारी नियति है।